आदर्श वीरांगना- रानी लक्ष्मीबाई

 आदर्श वीरांगना- रानी लक्ष्मीबाई



सन् १८५७ का गदर भारतीय इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। पिछले एक हजार वर्षों से भारतवासी निरंतर विदेशियों से दबते चले जाते थे।

 वीरता और शौर्य में तो वे किसी प्रकार कम नहीं थे, यहाँ के क्षत्रियों के समान निर्भय होकर लड़ने वाले सैनिक संसार में ढूँढने पर भी मिलना कठिन थे; पर आपस की फूट और असंगठन के कारण उनको प्रायः पराजय और असफलता का हो मुख देखना पड़ता था।

 मुसलमानी शासनकाल में तो फिर भी वे समय-समय पर अपनी वीरता का चमत्कार दिखाते रहते थे, पर अंगरेजी हुकूमत में सबको इस प्रकार बाँध दिया गया कि स्वतंत्र रूप से हाथ-पैर हिलना भी असंभव हो गया।

 अँगरेजों की नीति यही थी कि यहीं के सैनिकों और यहीं के साधनों से देश में एक एक भाग को अपने अधिकार में करते चले जाएँ। फौजों के अफसर जरूर अँगरेज रहते थे और तिहाई, चौथाई अँगरेज सिपाही भी सावधानी की निगाह से साथ में रखे जाते थे, पर ज्यादातर परिश्रम और लड़ने का काम भारतीय ही करते थे।

लगभग सौ वर्ष से इसी नीति से काम लेकर इन विदेशियों ने सन् १८५७ तक भारतवर्ष के नकशे का लगभग पौन भाग लाल रंग में रंग दिया था। पीले रंग वाला भाग (देशी राज्य) कठिनता से चौथाई रह गए थे और उनकी स्वतंत्रता भी दिन पर दिन सीमित की जा रही थी।

 गदर के पहले दस-पाँच वर्षों में अँगरेज गवर्नर जनरलों ने देशी राज्यों को हड़पने की नीति को बहुत तेज कर दिया था। सतारा, नागपुर, अवध, झाँसी आदि कितने ही राज्य झूठे बहाने से लगातार अँगरेजी हुकूमत में मिला लिए गए थे।

 अनेक छोटे जागीरदारों की भूमि पर भी सरकारी अधिकार कर लिया था इसके सिवाय जिस प्रकार संभव हुआ प्रजा का लूटकर भारतवर्ष का धन इंगलैंड पहुँचाया जा रहा था। इस प्रकार राजनीतिक आधिपत्य दृढ़ करने के साथ ही भारतीय धर्म और सभ्यता को भी दबाकर यहाँ ईसाईयत के प्रचार की चेष्टा की जा रही थी, जिससे लोगों में विरोध की भावना ही उत्पन्न न हो।

इन सब कारणों से कई वर्षों से देश के भीतर असंतोष का भाव बढ़ रहा था। उस समय प्रेसों और समाचारपत्रों का तो आजकल के समान प्रचार नहीं हुआ था, जिनके द्वारा वह असंतोष प्रकट ही सकता और शासक वर्ग उसकी गहराई का पता लगा सकता। वह भीतर ही भीतर घुमड़ रहा था।

 अकस्मात सिपाहियों को दिए जाने वाले कारतूसों में गाय और सूअर की चरबी होने की अफवाह उड़ी और भारतीय सेनाओं का एक भाग विद्रोह करने पर उतारू हो गया। जिन लोगों के राज्यों और जागीरों को अन्यायपूर्वक छीना गया था उन्होंने भी इस आग को और भी भड़काने में सहयोग दिया कुछ ही सप्ताह के भीतर देश के कई प्रांतों में, करीब एक हजार मील तक फैले भूभाग में विद्रोह की अग्नि धाँय-धाँय करके जलने लगी।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई भी इसी भारतीय स्वतंत्रता के लिए आरंभ किए गए रणयज्ञ की एक विशिष्ट 'होता' थी। यह नहीं कहा जा सकता कि इस योजना में गढ़ने में भी उनका हाथ था या नहीं? अँगरेज इतिहासकारों ने तो उनकी भी इस घटना का उत्तरदायी बतलाया है और भारतीय लेखकों के मतानुसार उनको संयोगवश ही इसमें भाग लेना पड़ा।

 कुछ भी हो, जब एक बार मैदान में आ गई, तो उन्होंने वह जौहर दिखलाए, जिसकी शत्रु-मित्र को किसी को आशा नहीं थी और तो क्या अँगरेजी सेना के एक बड़े सेनापति सर ह्यूरोज ने जिन्होंने झाँसी, कालपी और ग्वालियर में विद्रोहियों की बड़ी-बड़ी सेनाओं को हराकर फिर से अंगरेजों की सत्ता कायम की थी और जिनसे घोर युद्ध करते हुए ही रानी लक्ष्मीबाई ने आत्मोत्सर्ग किया था, इनकी वीरता की मुक्तकंठ से सराहना की थी। उन्होंने इस संबंध में अपनी घोषणा में जो शब्द कहे थे, वे आज तक इतिहास में अमर बने हुए हैं। उन्होंने लिखा था

"शत्रु-दल (भारतीय विद्रोहियों) में अगर कोई सच्चा मर्द था तो वह झाँसी की रानी ही थी।"

सर ह्यूरोज के इस कथन को पढ़, सहसा मुख से निकल जाता है-"रहिमन साँचे सूर को बैरिहु करें बखान ।" लक्ष्मीबाई झाँसी, कालपी और ग्वालियर तीनों ही स्थानों में सर ह्यूरोज की सेना से खूब लड़ी और उसको नाकों चने चबवा दिए। सच पूछा जाए तो अन्य सब 'विद्रोही-सरदार' अँगरेजी सेना के सामने एक भी जगह नहीं ठहरे, पर लक्ष्मीबाई ने उसका डटकर मुकाबला किया और बार-बार बलवान शत्रु का मुँह मोड़ दिया।

 वह तो एक तरफ उसके अल्प साधन और दूसरी ओर अँगरेजों के पास नए-नए हथियारों का होना था, जिससे अंत में विजयश्री अंगरेजी सेना को मिली, पर उस अकेली ने जिस प्रकार सैकड़ों सैनिकों का मुकाबिला करके बीसियों को धराशाई किया उसका उदाहरण उस युद्ध में दूसरा नहीं मिला। इसी से प्रभावित होकर, योरोप के प्रसिद्ध रणक्षे्रों के विजयी सेनापति और वीरों की सच्ची कदर करने वाले सर ह्यूरोज ने इस प्रकार के उद्गार प्रकट किए थे।