भारतीय ऋषियों का आदर्श

 भारतीय ऋषियों का आदर्श

पाठक देख सकते हैं कि सुकरात ने ज्ञानी व्यक्ति का जो लक्षण बतलाया, वह हमारे ऋषि-मुनियों के सिद्धांतों से पूर्णरूप से मिलता हुआ है। हमारे यहाँ कहा गया है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं। सामान्य रूप से ज्ञानी कहा जाने वाला व्यक्ति जितना जानता है, वह संपूर्ण ज्ञान-राशि की तुलना में एक घड़े में एक बूँद के समान भी नहीं है।

 जिनको 'महाज्ञानी' कहा जाता है, वे भी कभी यह नहीं कह सकते कि हमने पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लिया है। उदाहरण के लिए सांख्य और वैशेषिक जैसे जगत् प्रसिद्ध दर्शनों के रचयिता भी शिल्प, संगीत, काव्य के विषय में अपने को निष्णात नहीं कह सकते।

 फिर अध्यात्म-ईश्वर, जीव, आत्मा, परलोक जैसे सर्वथा अप्रत्यक्ष और अव्यक्त विषय में तो कोई दावे के साथ कुछ कैसे कह सकता है ? इसलिए भारतीय ऋषि-मुनियों ने सब कुछ वर्णन कर देने के बाद भी कहा है-नेति-नेति' ? अर्थात् जितना हम जानते थे उतना हमने बतला दिया, पर यह इस विषय की अंतिम सीमा नहीं है। इसके बाद भी जानने की बहुत सी बातें हैं, जिनका पता हमको नहीं, पर संभव है कि अन्य किसी को हो, अथवा आगे चलकर जिनकी जानकारी हो सके।

सुकरात ने भी अपने अभियोक्ताओं को उत्तर देते हुए यही कहा कि, मेरे ऊपर जो यह इलजाम लगाया गया है कि मैं जनता के बीच अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी बतलाकर उनको अपने मनमाने सिद्धांतों का अनुयायी बना लेता हूँ, तो इसमें सत्य का तनिक भी अंश नहीं है।

 मैं तो स्पष्टतया अपने को अज्ञानी ही मानता हूँ, क्योंकि मुझे ज्ञान समुद्र सामने लहराता दिखाई पड़ रहा है और मैं उसके किनारे पर पड़े सीप, घोंघा, कौड़ी आदि पदार्थों को समेटकर एक बालक के समान अपना मनोरंजन कर रहा हूँ। 

समुद्र की गहराई में जो बहुमूल्य मुक्ताराशि बिखरी पड़ी है, वहाँ तक तो मेरी पहुँच ही नहीं हो सकी है। इस तथ्य को जानते हुए भला मैं अपने 'ज्ञान' का गर्व कैसे कर सकता हूँ? तो भी इतना अंतर अवश्य है कि जब मैं अपने इस 'अज्ञान' की बात को समझता हूँ और स्वीकार भी करता हूँ, तब अन्य 'आचार्य' और पंडित' जो अधिकांश में अपने को 'ज्ञानी' ही मान बैठे हैं, यदि कोई उनके ज्ञान में शंका करता है तो वे उसे अपना विरोधी, शत्रु समझने लगते हैं।