जन्म और बाल्यावस्था

 जन्म और बाल्यावस्था



लक्ष्मीबाई के पूर्वज सतारा (महाराष्ट्र) के निवासी थे। जिस समय ईस्ट इंडिया कंपनी से हारकर पूना का पेशवाई शासन समाप्त हुआ, उस समय लक्ष्मीबाई के पिता मोरोपंत ताँबे की पेशवा बाजीराव (द्वितीय) के भाई चिम्नाजी अप्पा के यहाँ काम करते थे।

 कंपनी से संधि हो जाने पर बाजीराव आठ लाख वार्षिक की पेंशन पाकर बिठूर में रहने लगे और उनके भाई अप्पा साहब ने काशी-वास पसंद किया। उनको भी कंपनी की तरफ से पृथक पेंशन नियत की गई थी। मोरोपंत भी उनके साथ काशी आए,उनके निर्वाह के लिए अप्पा साहब ने ४० रुपये मासिक नियत कर दिया था।

मोरोपंत की पत्नी भागीरथी बाई बड़ी सुंदर और सद्गुणी स्त्री थी। इन दोनों पति-पत्नी में परस्पर बड़ा प्रेम भी था। इसी दंपती के यहाँ लक्ष्मीबाई का जन्म १६ नवंबर १८३४ को काशी में ही हुआ। पर ३-४ वर्ष की आयु में ही उनकी माता का देहांत हो गया और पालन-पोषण का भार उनके पिता मोरोपंत पर ही पड़ गया। उधर अप्पा साहब का देहांत भी इसके कई वर्ष पहले हो चुका था और मोरोपंत को जीवन-निर्वाह में बड़ी कठिनाई हो रही थी।

 इस स्थिति में उन्होंने बिठूर में बाजीराव के आश्रय में रहने का निश्चय किया। बाजीराव ने उदारतापूर्वक उनको अपने यहाँ स्थान दिया और वे अपनी पुत्री को लेकर पेशवा के परिवार के साथ ही रहने लगे।

जिस समय बालिका लक्ष्मीबाई बिठूर में पेशवाओं के महल में रहने लगी, उस समय बाजीराव के दत्तक पुत्र नाना साहब (जन्म-१८२४) उनके भाई बाला साहब तथा भतीजे राव साहब भी वहीं रहते थे बाजीराव ने इन सब बालकों की शिक्षा-दीक्षा की अच्छी व्यवस्था कर रखी थी।

 उनको पढ़ने-लिखने के साथ ही शस्त्र-संचालन और घुड़सवारी की शिक्षा भी दी जाती थी। लक्ष्मीबाई (जिसका नाम उस समय मनुबाई था) यद्यपि आयु में छोटी थीं, तो भी उन्हीं के साथ रहती थीं और सब प्रकार की शिक्षा प्राप्त करती थीं। वहीं से उसे घुड़सवारी और शस्त्र चलाने का शौक लग गया, जो आगे चलकर उसे एक आदर्श वीरांगना बनाने वाला सिद्ध हुआ। पेशवा बाजीराव भी उसकी सुंदर आकृति और भोलेपन को देखकर बड़े प्रसन्न रहते थे और उसे 'छबीली' कहकर पुकारते थे।

लक्ष्मीबाई बाल्यावस्था से ही तेजस्वी और अपनी बात पर डट जाने वाली थीं। जिस समय नाना साहब और राव साहब घोड़ा पर हवाखोरी को निकलते थे, तो वह भी घोड़े पर सवार होकर साथ जाता थी। एक दिन नाना साहब हाथी पर बैठकर जाने लगे तो वह भी हाथी के लिए हठ करने लगी।

 बाजीराव ने भी बहुत कहा कि 'छवबीली' को भी बिठा लो, पर नाना साहब न माने। उधर लक्ष्मीबाई हठ करती ही जाती थी। इस पर मोरोपंत को क्रोध आ गया और उसने कहा-"क्या तेरी तकदीर में हाथी पर बैठना लिखा है? क्यों व्यर्थ हठ करती है।" लक्ष्मीबाई ने तड़ाक से उत्तर दिया-"मेरे भाग्य में तो दस हाथियों पर बैठना लिखा है।" समय आने पर यह बात पूरी तरह सत्य हो गई। झाँसी की रानी होने पर वह नाना साहब से भी अधिक वैभवशाली बन गईं।