भौतिकवाद का विरोधी

भौतिकवाद का विरोधी

 यद्यपि इतना अधिक समय बीत जाने तथा देश-काल के बिल्कुल बदल जाने के कारण हम इस बात को पूरी तरह नहीं
समझ पाते कि सुकरात को जब किसी प्रकार का लोभ-लालच न था, और न वह किसी से भेंट-पूजा लेता था, तो उसे इस प्रकार उपदेशक' या 'गुरु' बनने की क्या आवश्यकता थी ? जब लोग चाहते थे कि वह उनके लड़कों को नई तरह की शिक्षा न दे और रास्ते में भेंट हो जाने पर उनसे इस तरह का वार्तालाप न करे, तो उसको इस कार्य में ऐसा कौन-सा महत्त्व जान पड़ता था, जिसके लिये उसने विष का प्याला पीकर अपनी जान तक दे दी ?

यद्यपि उस समय 'साम्यवाद' और 'समाजवाद' का नामकरण नहीं हुआ था और पूँजीवाद' तथा 'श्रमजीवी' का स्पष्ट वर्गीकरण भी नहीं हुआ था, पर जब हम सुकरात के बयान पर विचार करते हैं और उस समय के इतिहास को ध्यानपूर्वक पढ़ते हैं, तो हम कह सकते हैं कि मूल रूप में यह मतभेद और विवाद वैसा ही था जैसा आज गरीब-अमीर के बीच में देखने में आता है। इसके प्रमाणस्वरूप हम सुकरात के बयान में से एक उद्धरण नीचे देते हैं

"अब आप लोग समझ लीजिए कि यह भगवान् का ही आदेश है। मैं आप लोगों के बीच विचरण करके आप लोगों को समझाने के अतिरिक्त अन्य कोई भी काम नहीं करता। आप लोग नवयुवक हों अथवा वृद्ध, मैं आप सबसे कहता हूँ कि आप लोग अपने प्रति तथा अपनी संपत्ति के प्रति आसक्ति का त्याग कीजिए और सबसे पहले अपनी आत्मा के उत्कर्ष की ओर ध्यान दीजिए। मैं आप लोगों से कहता रहता हूँ कि धन के द्वारा शील (सदाचार) की उपलब्धि नहीं होती, वरन् शील के द्वारा ही मनुष्य श्रेय की प्राप्ति कर सकता है।"

"यह है मेरा उपदेश! और यदि यह सिद्धांत नवयुवकों के लिए 'कुशिक्षा' बतलाया जाता है, तो मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं एक 'कुचेष्टाकारी' व्यक्ति हूँ। अतएव हे एथेन्स के नागरिकों! मैं आप लोगों से कहता हूँ कि आप लोग चाहे 'अनूतास' (एक अभियोगकर्ता) के कथन को माने अथवा उसे अमान्य कर दें आप लोग मुझको मुक्त करे या न करें, इतना आप समझ लें कि मैं अपने आचरण में परिवर्तन कभी न करूँगा। इसके लिए मुझे अनेक बार मृत्युदंड सहन करना पड़े तो भी मैं इसे नहीं छोड़ूँगा।"

सुकरात के इस कथन से प्रकट होता है कि उस समय एथेन्स निवासियों में धन, वैभव और बाह्य आडंबर का महत्त्व बढ़ता जाता था और आध्यात्मिकता की तरफ से वे उदासीन होते जाते थे अन्य लेखकों के कथनों से भी यही जान पड़ता है कि उस समय एथेन्स वाले सांसारिक सुखों और आर्थिक-लिप्सा में फँसकर नैतिक उन्नति और जीवन को पवित्र बनाने वाले सद्गुणों को क्रमश: त्यागते जाते थे।

 सुकरात की दृष्टि में किसी भी जाति में इस प्रकार की मनोवृत्ति का बढ़ना उसके पतन और अंत में नाश का कारण होता है। इसीलिए अपने समकालीन लोगों में भौतिकवादी विचारधारा के प्रवाह को अवरुद्ध करके आध्यात्मिक भावनाओं को प्रवेश कराने के लिए वे इतने प्रयत्नशील थे।