नास्तिकता का आरोप

 नास्तिकता का आरोप

सुकरात के विरोधियों ने उस पर नास्तिकता का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जब हमारे धर्म में सूर्य-चंद्रमा को देवता माना जाता है, वह उनको जड़ पदार्थ बतलाकर नवयुवकों की श्रद्धा-भक्ति को मिटाने का प्रयत्न करता है। इतना ही नहीं, वह किसी भी देवता में तनिक भी विश्वास नहीं करता। वह एक कट्टर नास्तिक व्यक्ति है।

दुनिया का एक अजीब दस्तूर देखने में आता है कि ढोंगी व्यक्ति चाहे जितने नीच हों, आस्तिक बने रहते हैं और सच्चे व्यक्ति को जो अपनी बात को स्पष्ट कह डालता है, लोग नास्तिक की पदवी दे डालते हैं, चाहे वे आस्तिक और नास्तिक का वास्तविक आशय समझते भी न हों। सुकरात जिस प्रकार सत्य मार्ग पर चलता था, समस्त जिज्ञासुओं को बिना किसी लाभ की आशा के हितकारी सलाह देता था और इसके फलस्वरूप अपने जीविका के कार्य के

लिए यथोचित समय न पाने से दरिद्रता का जीवन बिताता था, उसे देखते हुए उसे कभी नास्तिक नहीं कहा जा सकता।

इसके बजाय नास्तिक वह है जो, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को हानि पहुँचाता रहता है, जो असत्य व्यवहार में किसी प्रकार का संकोच नहीं करता, जो अपने तनिक से लाभ के लिए झट से परमेश्वर की झूठी सौगंध खाता रहता है, जो ईश्वर और धर्म के नाम पर प्रतिज्ञा करके विश्वासघात करता रहता है ऐसे व्यक्ति चाहे रोज मंदिर में जाते हों, आसन पर बैठकर घंटा, दो घंटा माला फिराते हों, तिलक-छापा भी दूसरों से अधिक लगाते हों, पर फिर भी वे पक्के नास्तिक हैं।

 इसका कारण यही है कि जब वे परमात्मा की झूठी शपथ खाने में कुछ भी संकोच नहीं करते, न तनिक भी डरते हैं, तो कैसे माना जाए कि वे परमेश्वर के होने और उसकी शक्ति पर सच्चे दिल से विश्वास करते हैं।

पर जो व्यक्ति प्रलोभनों को ठुकराकर सच्चाई पर कायम रहता है और हानि सहकर भी दूसरों के उपकार में लगा रहता है, अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करके साधु-जीवन व्यतीत करता है, वह अवश्य ही आस्तिक है।

 ऐसा व्यक्ति चाहे हर समय भगवान् का नाम रटता न रहे और चाहे पूजा-उपासना के बाह्य कर्मकांडों में भी अधिक भाग न ले, पर वह अपना जीवन उन कामों के लिए अर्पित कर देता है, जिनको करने का भगवान् ने आदेश दिया है। फिर ऐसे व्यक्ति को नास्तिक कैसे कहा जा सकता है ? वह तो पक्का आस्तिक ही है। इसलिए सुकरात ने अदालत के सामने अपनी निर्दोषिता सिद्ध करते हुए कहा

"एथेन्स के नागरिक जानते हैं कि, मैं दिव्य अथवा आध्यात्मिक शक्तियों में विश्वास करता हूँ और उनकी शिक्षा नवयुवकों को देता हूँ। मेरे विरुद्ध जो अभियोग-पत्र न्यायालय में दाखिल किया गया है, उसमें भी यही बात कही गई है। तब मैं पूछना चाहता हूँ कि यदि मैं आध्यात्मिक शक्तियों में विश्वास करता हूँ तो पितृगण' और 'अर्ध देवताओं में अविश्वास करने वाला कैसे कहा जा सकता हूँ ? क्या कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है, जो घुड़सवारी

में विश्वास करता हो, पर घोड़ों के अस्तित्व से इनकार करे ? इसलिये जब मैं दिव्य शक्तियों को मानता हूँ तो उन्हीं के अंग और उषांग देवताओं और अर्ध-देवताओं के अस्तित्व और महत्त्व से कैसे इनकार कर सकता हूँ ?"

पर मैं जानता हूँ कि मेरे विरुद्ध जो अभियोग लगाये गये हैं, उनका वास्तविक कारण मेरी आस्तिकता अथवा नास्तिकता नहीं है, वरन् कुछ लोगों ने मेरे विरुद्ध जो विद्रोह फैलाया है, वही उसका सच्चा कारण है। इसलिए यदि इस अभियोग के फलस्वरूप मेरी मृत्यु होती है, तो उसका कारण वह विद्वेष और विरक्तता का भाव ही होगा।

 ऐसे ही कारणों से पहले भी अनेक सज्जन मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं और आगे भी होते रहेंगे। इस तरह कुछ लोगों के विद्वेष के फलस्वरूप मरने वालों में मेरा नाम अंतिम न होगा।"