घर के शत्रुओं से युद्ध

 घर के शत्रुओं से युद्ध

यद्यपि विधवा होने के बाद लक्ष्मीबाई ने अपना रहन-सहन बहुत सादा बना लिया था और वह अपना अधिकांश समय धार्मिक कार्यों में ही व्यतीत करती थीं, पर जब उसे शासन-संचालन की जिम्मेदारी उठानी पड़ी तो उसने उस कार्य को भी ऐसी संलग्नता और परिश्रम के साथ किया कि कुछ ही समय में झाँसी की रंगत बदल गई। उसका वर्णन करते हुए 'कानपुर के विद्रोही' पुस्तक में कहा गया है

"रानी लक्ष्मीबाई ने सैनिक महत्त्व के स्थानों की रक्षा पर पूरा ध्यान दिया था। नई तोपें ढाली गईं, नए सिपाही भरती किए गए, एक टकसाल खोली गई। शासन के प्रत्येक विभाग में रानी के दृढ़ चरित्र का प्रभाव पड़ा। २३ वर्षीय इस नारी ने अपने उत्साह, उद्योग एवं अध्यवसाय से अपने सभी साथियों और झाँसी के निवासियों के हृदय में मोहन-मंत्र फूंक दिया। वह शासन-कार्य की देख-भाल स्वयं करती थीं। सिर पर एक चमकदार लाल रेशम की टोपी लगाती थीं, जिसमें चारों ओर मोती और जवाहरात जड़े थे।

 एक बहुमूल्य मोतियों की माला उनके गले में रहती थी। उनकी कंचुकी सामने खुली रहती थी और कमर तक लटकती रहती थी एक जरी के काम वाला कमरबंद उसे बाँधे रहता था। इस कमरबंद में दमिश्क की नक्काशी के चाँदी में मढ़े दो तमंचे खोंसे हुए थे। एक बहुत तेजधार का छुरा भी इसी में लटका रहता था। साड़ी के स्थान पर वे ढीला पायजामा पहनतीं थीं। इस तेजस्वी वेश का प्रभाव सब पर पड़ता था। प्रतिदिन महालक्ष्मी के मंदिर में वे घोड़े अथवा पालकी पर सवार होकर दर्शन करने जाती थीं । घोड़े की सवारी का उनको बड़ा शौक था और अश्वपरीक्षा में वे अत्यंत निपुण थीं।"

"कचहरी में काम करते समय उनको कोई नहीं देख पाता था, क्योंकि उनका स्थान सबसे अलग था। उसके दरवाजे पर दी सिपाही सुनहरी छड़ियाँ लेकर खड़े रहते थे। महारानी के पास दीवान लक्ष्मी राव कागज, कलम लेकर बैठे रहते और वे जो कुछ बोलती थीं उसे लिखते जाते थे। महारानी बहुत चतुर थीं और उनके सामने जो मामला आता, उसकी खूब जाँच करके उचित फैसला करतीं थीं। इनके न्याय से समस्त प्रजा खुश थी, यह बात अँगरेज लेखकों ने स्वयं लिखी है। महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण स्त्री होने के कारण वे परदा नहीं करती थीं और अपने पति की गद्दी पर बैठकर ही राज्य-संचालन करती थीं।"

रानी को राज्य-भार सँभाले कुछ ही समय हुआ था कि सदाशिव राव नारायण नामक व्यक्ति, जो गंगाधर राव का कोई दूर का संबंधी था, उठ खड़ा हुआ और अपने को झाँसी की गद्दी का हकदार बतलाने लगा। वह कुछ सेना लेकर झाँसी को जीतने के लिए चला और शहर से तीन मील के फासले पर करेरा गाँव पर चढ़ाई की। उसने वहाँ से सरकारी थानेदार व तहसीलदार को मारकर भगा दिया और आस-पास के मनुष्यों को तंग करके कर वसूल करने लगा। उसने राजपुर के थानेदार के पास भी यह खबर भेजी-"सारे गाँव में ऐलान कर दो कि अब सदाशिव राव ही राजा है। जब थानेदार ने उसकी बात न मानी तो उसने उसकी सारी जायदाद छीनकर नौकरी से अलग कर दिया।"

जब इन घटनाओं की खबर रानी लक्ष्मीबाई को मिली तो उसने थोड़ी सी सेना लेकर करेर पर चढ़ाई कर दी। सदाशिवराव भागकर ग्वालियर के राज्य में चला गया और वहाँ से फिर तैयारी करके झाँसी की तरफ आया। इस बार गिरफ्तार करके उसे कैदखाने में बंद कर दिया गया।

इसके बाद ओरछा के दीवान नत्थेखाँ ने २० हजार फौज लेकर झाँसी पर आक्रमण किया। उसकी ताकत को अधिक देखकर कितने ही सरदार डर गए और झाँसी का शहर और किला नत्थेखाँ के सुपुर्द करने की सलाह देने लगे। यह सुनकर रानी को बड़ा क्रोध आया और उसने कहा

"बड़ी लज्जा की बात है कि आप मर्द होकर ऐसी बात मुख से निकालते हैं। मैं स्त्री होने पर भी अपने हक से पीछे नहीं हट्ूँगी। दुनिया में एक दिन तो सबको मरना है। यदि हम अपने न्यायपूर्ण अधिकार के लिए युद्ध में वीरता दिखाकर मर जाएँ तो हमको परलोक में भी सम्मानीय स्थान प्राप्त होगा। मैं तो युद्ध से हरगिज पीछे नहीं हट सकती।"


जब नत्थेखाँ की फौज झाँसी के किले के पास पहुँची तो उस पर तोपों से ऐसी गोलाबारी की गई कि वह सामने ठहर न सकी। तब उसने अपनी सेना को चार भागों में बाँटकर नगर के चार दरवाजों पर हमला किया। यहाँ भी झाँसी की सेना ने बड़ी वीरता से उसका सामना किया। रानी स्वयं फाटकों पर घूमती हुई सिपाहियों का साहस बढ़ाती रहतीं थीं। कई दिन बाद नत्थेखाँ का साहस टूट गया और वह हार मानकर अपने स्थान को वापस चला गया।


इस प्रकार थोड़े ही दिन में रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी योग्यता, वीरता और कर्मशीलता की छाप सब दरबारियों और आस-पास के बुंदेला शासकों पर लगा दी। उस कठिन समय में जबकि देश में भयंकर राजनीतिक भूचाल आया हुआ था और बड़े-बड़े राजभवन डगमगा रहे थे, झाँसी की रानी दृढ़तापूर्वक अपने राज्य में शांति और सुव्यवस्था कायम रखकर प्रजा को सुखी बनाने का प्रयत्न कर रही थीं। उसकी आयु बहुत कम थी, राज्य संचालन का उसे कोई अनुभव न था, चारों तरफ नई-नई बाधाएँ उत्पन्न हो रहीं थीं, फिर भी उसके सुशासन की प्रशंसा झाँसी निवासी आज तक करते हैं। 

कारण यही था कि जहाँ अधिकांश शासक अपना ध्यान शान-शौकत और सुखोपभोग की तरफ लगाते हैं, लक्ष्मीबाई ने परोपकार और कर्त्तव्यपालन को अपना धर्म समझ रखा था। अपने पति का स्वर्गवास और राज्य पर अंगरेजों का आधिपत्य हो जाने पर जहाँ उनका पूरा समय पूजा-पाठ और धार्मिक कृत्यों में व्यतीत होता था, यहाँ अब परिस्थिति के बदल जाने से वे एक श्रेष्ठ शासनकर्ता और चतुर राजनीतिज्ञ का पार्ट अदा कर रही थीं। पूजा-पाठ वे अब भी करतीं थीं और देवमंदिर में दर्शनों के लिए भी नियमपूर्वक जाती थीं, पर इस समय उनका मुख्य ध्येय राज्य की सुरक्षा और प्रजा को अपनी न्यायपरायणता द्वारा संतुष्ट रखना और सुखी बनाना था। वास्तव में स्त्री हो या पुरुष, मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार


उज्ज्वल चरित्र और सच्ची कर्त्तव्यनिष्ठा है। उस जमाने में मुसलमानी और अंगरेजी शासन में पराधीन रहने से अधिकांश राजाओं का नैतिक स्तर गिर गया था और वे प्रजा की उन्नति और सुख-समृद्धि की अपेक्षा अपने वैभव और विलास की तरफ ही अधिक ध्यान देते थे । उस समय लखनऊ के वाजिदअली शाह जैसे शासक भी थे, जिनका समस्त समय जनानखाने में ही व्यतीत होता था और सिवाय नाचने गाने तथा तरह-तरह की रंगरेलियों के अलावा और कोई काम न था। ऐसे युग में यदि लक्ष्मीबाई ने एक प्रसिद्ध राज्य की अधिकारिणी बन जाने पर पूर्ण संयम और त्याग का जीवन व्यतीत किया और अपनी संपूर्ण शक्ति को प्रजापालन में लगा दिया, तो यह निश्चय ही बड़े गौरव की बात थी। यही कारण है कि जहाँ उस समय के बहुत बड़े नरेशों का कोई जिक्र भी नहीं करता, झाँसी की रानी की गुणगाथा और वीरता की कथा इतिहास और लोकगीतों का महत्त्वपूर्ण विषय बनी हुई है।


भारतीय स्त्रियाँ, जो अपने को 'अबला' और 'असहाय' कहकर प्राय: कर्मठता और कठिनाइयों के जीवन से विलग रहती हैं; रानी लक्ष्मीबाई के उदाहरण से बहुमूल्य प्रेरणा ले सकती हैं। उस युग में एक उच्च पदस्थ नारी का आदर्श भी यही था कि संघर्ष के अवसर पर अपनी मनोवृत्तियों को संयत रखकर पति को कर्तव्यपालन के लिए प्रोत्साहित करे और किसी प्रकार की स्वार्थजनित निर्बलता प्रकट न करे। यद्यपि उस समय सती-प्रथा कानूनन बंद कर दी गई थी, तो भी प्राचीन परंपरा की यह भावना अवश्य कुछ अंशो में शेष थी कि यदि कोई स्त्री पति का अंत हो जाने पर स्वयं भी प्राणोत्सर्ग कर देती है, तो वह बड़े सम्मान की अधिकारिणी है। 

पर लक्ष्मीबाई ने अपने उदाहरण से सिद्ध किया कि पति के साथ "जल मरने की अपेक्षा कहीं अधिक बड़ा और श्रेष्ठ आदर्श यह है कि स्त्री अपने पति के जीवन-कार्य को स्थिर रखे और आगे बढ़ाए । उन्होंने पति की मृत्यु के बाद उनके वंश और राज्य को कायम रखने की पूरी चेष्टा ही नहीं की, वरन अवसर आने पर ऐसा महान कार्य कर दिखाया, जिससे उसके पति गंगाधर राव और झाँसी का नाम भी भारतीय इतिहास के पृष्ठों पर स्थायी रूप से अंकित हो गया।"