सेवा और सहिष्णुता के आदर्श-संत सुकरात

सेवा और सहिष्णुता के आदर्श-संत सुकरात

ईसा मसीह के जन्म से भी चार सौ वर्ष पहले एथेन्स (यूनान) के न्यायालय में एक सत्तर वर्षीय वृद्ध मनुष्य खड़ा हुआ था उसके ऊपर अभियोग लगाया गया था कि वह नवयुवकों को विपरीत उपदेश देकर गलत रास्ते पर ले जाता है। दूसरा अभियोग यह भी था कि उसने प्रजातंत्र के अधिकारियों के आदेश की अवहेलना की है। यह अभियुक्त और कोई नहीं, पश्चिमी संसार का अति प्राचीन दार्शनिक सुकरात था।

संसार में यह भी एक अनोखा दृश्य है कि जिन लोगों को आज दुनिया पूजती है, महान् संत और देवदूत मानती है, उन्हीं को एक समय 'बुद्धिमान्' और 'न्यायकर्ता' कहे जाने वाले लोगों ने अभियुक्त बनाया और कड़े से कड़ा दंड दिया। अन्यथा कौन कह सकता है कि सुकरात, ईसा, मार्टिन लूथर आदि किसी भी दृष्टि से 'अपराधी' या 'दोषी' थे। पर जिस प्रकार दुष्टों की दृष्टि में साधु व्यक्ति दोषी जान पड़ता है, जैसे हिरनाकुश को राम नाम लेने वाला प्रहाद शत्रु जान पड़ता था, उसी प्रकार ये महापुरुष भी कुछ व्यक्तियों को अपने सत्य-व्यवहार और न्याय-परायणता के कारण 'दोषी' जान पड़ते थे।

 आजकल भी कुछ राजनीतिक मतभेद के कारण गाँधी, कैनेडी, लूथर किंग जैसे लोक कल्याणकारी महामानवों को गोली से उड़ा दिया जाता है। पर अब यह कार्य खुली अदालत में धर्म, कानून तथा न्याय के नाम पर नहीं होता, वरन् जिन लोगों के स्वार्थ को उन महापुरुषों के सत्य का पक्ष ग्रहण करने से अपनी हानि जान पड़ती है, वे ही उनके प्राणों के ग्राहक हो जाते हैं।

इसीलिए जब सुकरात (जन्म ईसा से ४६६ वर्ष पूर्व) के अभियोगकर्ताओं ने नागरिकों को संबोधित करके यह कहा कि, आप लोग सावधान रहें और सुकरात के भाषण-जाल में न फेंस जायें. तो सुकरात ने उत्तर दिया कि-"एथेन्स का प्रत्येक नागरिक जानता है कि मुझमें चाहे और कोई दोष हों, पर मैं असत्य-भाषी तो कदापि नहीं हैं। हों, यदि उनका आशय यह है कि मेरा सत्य भाषण लोगों को आकर्षित कर लेता है और उसी को वे 'जाल' समझते हैं तो मैं इस आरोप को स्वीकार कर लूँगा।

 अनेक बुद्धिमान्' कहलाने वाले कहते है कि सुकरात आकाश के विषय में वितर्क करता है, पाताल की पड़ताल करता है और कुत्सित बात को समुचित सिद्ध कर देता है। उनका संकेत इन बातों से यह है कि मैं देवताओं' पर आस्था नहीं रखता। पर इस बात में किंचित भी सत्यांश नहीं। मैं कोई वैज्ञानिक नहीं हूँ और एक ऐसे विषय में काल्पनिक बातें कदापि नहीं करता, जिसकी मुझे कोई जानकारी नहीं।"

फिर भी अभियोक्ता लोग और उनके सहकारी मुझे प्रज्ञावान्' (बुद्धिशाली) कहते हैं, तो इसका कोई कारण अवश्य होगा। मेरा तो अनुमान है कि मेरे एक मित्र 'काइरोफोन' ने डेलफाई मंदिर के देवता से पूछा था कि-"क्या सुकरात से बढ़कर बुद्धिमान् कोई अन्य व्यक्ति है या नहीं ?" इस पर देवता ने देववाणी की, और मंदिर की पुजारिन ने उसका जो आशय बतलाया वह यही था कि देवता ने मुझे प्रज्ञावान्' बताया है।

 जब मैंने यह सुना तो बड़ा आश्चर्यचकित हुआ कि, मैं तो अपने को अच्छी तरह जानता हूँ कि मेरे अंदर किसी प्रकार की प्रज्ञा नहीं है। तब देवता का वास्तविक आशय क्या हो सकता है ? इसकी जाँच-पड़ताल करने के लिए मैं विद्वानों, राजनीतिज्ञों, कवियों, शिल्पकारों के पास यह जानने को गया कि उनमें से कोई अधिक प्रज्ञावान् है या नहीं ? पर सब जगह मुझे ढोल के अंदर पोल ही मिली। ये लोग अपने को 'प्रज्ञावान्' कहते अवश्य थे, पर दरअसल अपने पेशे की कुछ बातों को छोड़कर संसार का उनको कुछ भी ज्ञान न था।

"मैंने समझा कि, मैं इस 'अर्थ' में 'प्रज्ञावान् कहा जा सकता हूँ कि मैं अपने 'अज्ञान' को जानता हूँ, जबकि वे लोग 'अज्ञानी' होते हुए भी अपने को प्रज्ञावान्' मानते थे और वैसा ही दावा करते थे। जब मैंने उनकी इस झूठी 'प्रज्ञा' का भंडाफोड़ कर दिया तो वे सब मेरे शत्रु बन गये और उसी का परिणाम है कि आज मेरे ऊपर इस प्रकार का आरोप लगाया गया है।"

इतना कहकर सुकरात् ने बतलाया कि-- "सत्य तो यह है कि केवल भगवान् ही प्रज्ञावान्' है। वे ही मेरे तथा अन्य प्रसिद्ध व्यक्तियों के बीच इस तरह की परीक्षा उपस्थित करके यह दिखलाना चाहते हैं कि मनुष्य की 'प्रज्ञा' अत्यल्प तथा नाम मात्र की है। भगवान् ही मेरे नाम को निमित्त बनाकर एक दृष्टांत दे रहे हैं। इस प्रकार वे ही कह रहे हैं कि-हे मनुष्यों! वही मनुष्य प्रज्ञावान्" है, जो सुकरात की तरह यह जानता है कि उसकी अपनी प्रज्ञा' का कोई मूल्य नहीं।"