विवाह और वैधव्य

 विवाह और वैधव्य



लक्ष्मीबाई का विवाह गंगाधर राव से ही हो जाने पर उसके पिता तथा अन्य संबंधी झाँसी ही आकर रहने लगे। मोरोपंत को दरबार में एक सरदार की पदवी दी गई और तीन सौ रुपये मासिक वेतन मिलने लगा तथा लोग भी अच्छे पदों पर नियुक्त किए गए। गंगाधर राव एक अच्छी योग्यता वाले और प्रजाहितैषी शासक थे। उन्होंने सर्वसाधारण की भलाई के लिए अनेक कार्य किए। सबके साथ दयालुता का व्यवहार करने के कारण लोग उनको 'काका साहब' कहकर पुकारते थे उनके पश्चात झाँसी के राज्य का क्या होगा, इसका उन्हें बड़ा खयाल रहता था, क्योंकि वे देख रहे थे कि निस्संतान राजाओं के राज्यों पर अँगरेजी सरकार किस प्रकार एक एक करके अधिकार जमाती चली जाती है।

जब विवाह को ८ वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी कोई संतान नहीं हुई, तो उनका ध्यान धार्मिक कार्यों की तरफ गया और सन् १८५० में वे तीर्थयात्रा के लिए निकले। सबसे पहले काशी पहुँचे, फिर गया, प्रयाग आदि की भी यात्रा की। जहाँ कहीं गए, वहाँ खूब दान पुण्य किया। वहाँ से वापस आने पर लक्ष्मीबाई गर्भवती हुई और १८५१ में उसने एक पुत्र को जन्म दिया| इससे सबको अत्यंत प्रसन्नता हुई और एक महीने तक नगर में बड़ी खुशी मनाई गई। पर यह प्रसन्नता अल्पकालीन ही सिद्ध हुई, क्योंकि तीन मास की आयु में ही बालक का देहावसान हो गया । 

गंगाधर राव को तो इससे इतना अधिक मानसिक कष्ट हुआ कि वे बीमार पड़ गए और उन्होंने खटिया पकड़ ली। बहुत कुछ इलाज किए जाने पर सन् १८५२ में स्वास्थ्य में कुछ सुधार जान पड़ा। पर अब भी बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं हुई थी, जिससे उनको पथ्य-भोजन ही ग्रहण करना पड़ता था। अक्टूबर १८५३ में एक श्राद्ध के अवसर पर उन्होंने कुछ खा लिया, जिससे रोग फिर एक दम बढ़ गया। परिणाम यह हुआ कि वे दशहरे के दरबार में भी आकर न बैठ सके। ठस अवसर पर समस्त सरदारों और प्रतिष्ठित नागरिकों ने रानी लक्ष्मीबाई को विश्वास दिलाया कि उन सबको सहानुभूति पूरी तरह से महाराज के साथ है, क्योंकि वे सदैव सुख-दुःख का पूरा ध्यान रखते हैं और उन्होंने कभी किसी के साथ अन्यायपूर्ण या बुरा बरताव नहीं किया। सबने मिलकर महाराज की दीर्घायु के लिए भगवान से प्रार्थना की।

पर प्रजा की शुभाकांक्षाएँ और बड़े-बड़े वैद्य, हकीम तथा डॉक्टरों का इलाज, कुछ भी काम न आया। स्वास्थ्य दिन पर दिन गिरता ही गया और नवंबर के दूसरे सप्ताह में यह जान पड़ने लगा कि अब महाराज का अधिक समय तक जीवित रह सकना संभव नहीं। यह देखकर लक्ष्मीबाई के पिता और राज्य मंत्री नृसिंहराव महाराज के पास गए और भविष्य में राज्य की व्यवस्था के संबंध में विचार किया गया। सोच-विचारकर यह तय हुआ कि अपने घराने के वासुदेव नेवालकर के पुत्र आनंदराव को जिसकी आयु पाँच वर्ष की थी, दत्तक युवराज बना दिया।

महाराज ने अपनी हालत खराब होती देखकर इस कार्य को तुरंत संपन्न किया और बुंदेलखंड के असिस्टेंट पॉलीटिकल एजेंट मेजर एलिस को अपने हाथ से एक खरीता (राजकीय पत्र) दिया, जिससे कंपनी-सरकार को यह सूचना दी गई कि उन्होंने आनंदराव को दत्तक पुत्र के रूप में ले लिया है और उसका नाम दामोदर राव रखा। पत्र में यह भी प्रार्थना की गई थी कि उनका देहावसान होने पर दामोदर राव को ही उसका उत्तराधिकारी माना जाए।

 जिस समय महाराज ने अपना वसीयत नामा असिस्टेंट पॉलीटिकल एजेंट को दिया, तो साहब का दिल भर आया और उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे अवश्य इसे स्वीकृत करा देंगे। पर जब वसीयतनामा और मेजर एलिस का पत्र पॉलीटिकल एजेंट मेजर मैलकम के पास पहुँचा. तो उन्होंने गवर्नर जनरल को अपनी तरफ से यह पत्र भेजा

"खेद के साथ सूचना दी जाती है कि झाँसी के महाराज २१ नवंबर १८५३ को परलोकवासी हो गए। मृत्यु से पूर्व महाराज ने पाँचवर्षीय एक बालक दामोदर राव को अपना दत्तक पुत्र बनाया और यह भी कहा कि यह लड़का हमारा नवासा है। परंतु मुझे ऐसा विदित होता है कि यह लड़का महाराज रघुनाथ राव की दूसरी पुस्त से है और अँगरेजी कानून के अनुसार महाराज का चचेरा भाई है। जो वसीयत नामा महाराज ने मुझे भेजा है, वह मैं साथ में भेज रहा हूँ। मुझे ऐसा विदित होता है कि महाराज ने अपने स्वर्गवास के समय दत्तक लेने का विचार किया, पर इस कार्य पर झाँसी के अमीर लोग अवश्य खेद प्रकट करेंगे।

 उनको आशा थी कि महाराज गंगाधर राव के पश्चात अँगरेजों की देख-रेख में राज्य का प्रबंध होगा। पर जब महाराज ने सोचा कि झाँसी के सूबेदार शिवराम भाऊ के वंश में जिसके साथ साथ सरकार का पहला संधिपत्र लिखा गया था, कोई नहीं है, तो उन्होंने यह दत्तक पुत्र लिया। सरकार की जानकारी के लिए मैं महाराज की वंशावली भेज रहा हूँ, जिससे विदित होता होगा कि यह लड़का महाराजा रघुनाथ के वंश का है।"

"मैंने १ नवंबर को एक पत्र मेजर एलिस को भी भेजा था और उसी के अनुसार कार्यवाही कर रहे हैं। जब तक झाँसी के विषय में सरकार की पूरी स्वीकृति न आ जाएगी, तब तक स्वर्गीय महाराज के दत्तक का कुछ भी विचार न किया जाएगा। झाँसी के राजा का अँगरेजी सरकार से क्या संबंध है? यह बतलाने को कुछ प्रमाण लिखे जाते है। इन पर विचार करने से मालूम होगा कि झाँसी के राजा को अपने राज्य का वारिस बनाने का अख्तियार है या नहीं?"

इस पत्र से स्पष्ट है कि मैलकम साहब ने महाराज गंगाधर राव के मरते ही झाँसी के राज्य को अँगरेजी अधिकार में करने का विचार कर लिया था। अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए उन्होंने यह दलील पेश की कि पेशवा बाजीराव ने सन् १८१६ के सुलहनामे के द्वारा झाँसी राज्य का पूरा अधिकार हमको दे दिया था और हमने ही शिवराम भाऊ के पौत्र को गद्दी पर बिठाकर उसे 'सूबेदार' के बजाए 'महाराज' का खिताब दिया था। उसके निस्संतान मर जाने पर राज्य के असली हकदार की तलाश की गई। उस समय शिवराम भाऊ के दो पुत्र (रघुनाथ राव और गंगाधर राव) जीवित थे, उन्हीं को एक के बाद एक राज्य का अधिकार दिया गया। पर अब गंगाधर राव की मृत्यु हो जाने से उस वंश की इतिश्री हो गई और इससे आगे किसी को उनका उत्तराधिकारी नहीं माना जा सकता।

महाराज गंगाधर राव ने अंतिम समय में जिस बालक दामोदर राव को दत्तक देकर रानी लक्ष्मीबाई को उसका अभिभावक नियत किया था, उसके संबंध में मेजर मैलकम ने लिखा-"महाराज गंगाधर राव ने जिस स्त्री (लक्ष्मीबाई) को राज्य की व्यवस्था सौंपने की इच्छा प्रकट की है, वह हर तरह से योग्य है। परंतु इस समय की अवस्था को देखते हुए विश्वास है कि सरकार इस इलाके को अपने काबू में करेगी और रानी साहिबा तथा उनके संबंधियों को कोई अच्छा 'वजीफा' देकर आराम पहुँचाएगी। रानी साहिबा के लिए कितने रुपये की जरूरत होगी, यह बतलाना बहुत कठिन है। चूँकि बुंदेलखंड में मरहठों का आखिरी खानदान है, इसलिए सब बातों को विचार करते हुए मैं यह परिणाम निकालता हूँ कि महारानी को ४००० रुपये वार्षिक से कम न दिया जाए।"

अंगरेज सरकार की नीति उस समय यही थी कि कम से कम जितनी रियायत देने से इस देश के पुराने शासक और प्रजागण शांत रह सकें, उतना उनको देकर शेष समस्त अधिकारों को उससे छीन लिया जाए। खासकर जिस समय महाराज गंगाधर राव की मृत्यु हुई और उनके दत्तक पुत्र दामोदर राव को रानी लक्ष्मीबाई की संरक्षकता में झाँसी राज्य का अधिकारी बनाने का प्रश्न उठा, उस समय देश में लार्ड डलहौजी का शासन चल रहा था। वे देशी राज्यों के विरुद्ध थे, एक-एक करके कितने ही राज्यों का अंगरेजी शासन के अंतर्गत ला चुके थे। इस समय ईस्ट 'इंडिया' कंपनी का शासन इस देश में इतना जम चुका था और उसकी सैन्य शक्ति इतनी सुदृढ़ हो चुकी थी कि उसे देशी राजाओं की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी, उसकी निगाह में अब केवल 'जमींदारों' की तरह रह गए, जो केवल छत्र, मुकुट और आभूषणों से सज-धजकर सिंहासन पर बैठ जाते हैं और खजाने के रुपया को भोग-विलास के कार्यों में बरबाद किया करते हैं। इसलिए अँगरेजी अधिकारियों ने यह निश्चय कर लिया था कि किसी भी राजा के निस्संतान मर जाने पर उसको दत्तक लेने का अधिकार न दिया जाए और उसका राज्य कंपनी शासन में मिला लिया जाए।

इस नीति के अनुसार गंगाधर राव के मरते ही मेजर एलिस ने तुरंत ही झाँसी के खजाने में ताला लगा दिया और गवर्नर जनरल की आज्ञा की प्रतीक्षा में राज्य का पूरा प्रबंध अपने हाथ में ले लिया। इस तरह चार महीने बीत गए, तो भी भारत सरकार का कोई हुक्म नहीं आया। यह देखकर रानी लक्ष्मीबाई ने सरकार के पास एक और खरीता भेजा, जिसमें झाँसी के राजवंश और अँगरेजी सरकार के बीच प्राचीन मित्रता का उल्लेख करते हुए दामोदर राव को राज्य का अधिकारी स्वीकृत किए जाने की प्रार्थना की गई थी। 

लार्ड डलहौजी ने स्वीकार न किया और २७ फरवरी १८५४ को एक घोषणा द्वारा झाँसी के राज्य को ब्रिटिश शासन में मिला लेने की आज्ञा दे दी। उन्होंने निर्णय किया कि झाँसी का राज्य स्वतंत्र नहीं है, वरन पारितोषिक के रूप में जागीर की तरह दिया गया था। अत: उसका कोई अधिकारी न होने की सूरत में वापस ले लेने का पूर्ण अधिकार है। उन्होंने यह भी दलील दी कि झाँसी राज्य अन्य अँगरेजी जिलों के बीच में पड़ता है और उसे अँगरेजी शासन में ले लेने से राज्य व्यवस्था में सुविधा रहेगी।

जब अँगरेज रेजीडेंट ने गवर्नर जनरल की इस घोषणा को रानी लक्ष्मीबाई को पढ़कर सुनाया तो रानी ने दृढ़ किंतु मधुर स्वर से कहा "मेरा झाँसी देगा नहीं।" उस समय रानी की इस दृढ़तापूर्ण वाणी का कोई परिणाम नहीं निकला। उनको पाँच हजार की सालाना पेंशन, नगर के राजमहल में रहने का अधिकार मिला। पारिवारिक तथा आभूषणों आदि पर उनका स्वामित्व स्वीकार किया गया। झाँसी के खजाने से छह लाख रुपये निकालकर दामोदर राव के नाम से अँगरेजी खजाने में जमा कर दिए गए, जो उसे वयस्क होने पर मिल सकते थे ।

लक्ष्मीबाई ने इस आज्ञा का बहुत विरोध किया और कई महीने तक पेंशन लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने उमेश चंद्र बनर्जी नामक हिंदुस्तानी वकील तथा एक योरोपियन वकील को ६० हजार रुपये खरच करके कंपनी के 'बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स के पास अपील करने को लंदन भेजा। पर उसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। तब विवश होकर उन्होंने पेंशन लेना आरंभ किया तथा उनका अधिकांश समय पूजा-पाठ में व्यतीत होता था। जो समय बचता था, उसमें वे घुड़सवारी और व्यायाम करतीं थीं। दामोदर राव को वे अपने पुत्र के समान ही प्यार करती थीं।

 ७ वर्ष की आयु में दामोदर राव का यज्ञोपवीत संस्कार बड़ी धूम-धाम से किया गया। इसके लिए उसके नाम से जमा छह लाख रुपये में से एक लाख रुपया निकाला गया। पहले तो सरकार ने कहा कि वे रुपये दामोदर राव के वयस्क होने पर ही दिए जा सकते हैं; पर जब अधिक जोर दिया गया तो इस शर्त पर रुपया देने की आज्ञा दी गई कि उनको कुछ समय बाद फिर जमा कर दिया जाए। लक्ष्मीबाई ने भविष्य की बात को अनिश्चित समझकर इस शर्त को मानकर रुपया ले लिया। यह सन् १८५६ की बात है।