सुकरात के समय का यूनानी-समाज-

 सुकरात के समय का यूनानी-समाज-

सुकरात ने आत्मा, ज्ञान और सदाचार के संबंध में जो उच्च विचार प्रकट किये और उनके अनुसार स्वयं आचरण करके दिखलाया, उसका महत्त्व उस समय और बढ़ जाता है, जब हमको यह पता लगता है कि वे ऐसे युग और समाज में उत्पन्न हुए थे, जो मुख्यतया 'सैनिक-समाज' था और जिसमें अध्यात्म-साधना की कोई संभावना न थी। अबसे ढाई हजार वर्ष पूर्व यूनान और उसके आस-पास का समाज मुख्यतया दो विभागों में बँटा रहता था-एक स्वामी और दूसरा दास।

 उस समय दास खरीदे और बेचे जाते थे और उन पर स्वामी का उसी प्रकार पूर्ण अधिकार होता था, जैसा गाय, भैंस, बकरी आदि पर उनके स्वामियों का होता है। वे लोग इन पशुओं को चाहे अच्छी तरह रखें, चाहे नित्य डंडों से मारें-पीटें और चाहे उनको काट डालें, कोई उनसे कुछ कहने वाला नहीं होता। उस जमाने में प्रायः विभिन्न प्रदेशों और जातियों में युद्ध हुआ करते थे और उनमें जो व्यक्ति पकड़े जाते थे, वे ही दास बना लिए जाते थे।

वे अपने स्वामियों की अचल संपत्ति की तरह होते थे, जिनको वे इच्छानुसार खरीद और बेच सकते थे और उनसे हर तरह का काम करा सकते थे।

दूसरा नियम उस समय यह था कि प्रत्येक नागरिक को देश की सेना में भर्ती होकर राज्य की आज्ञानुसार युद्धों में भाग लेना पड़ता था। यद्यपि उस समय यूनान के अधिकांश भागों में प्रजातांत्रिक ढंग के 'नगर-राज्य' स्थापित थे, तो भी उन पर कुछ प्रसिद्ध और कुलीन पुरुषों का आधिपत्य होता था, जो बहुत-से कार्य अपने लाभ की दृष्टि से भी कराया करते थे। आरंभ में तो सुकरात ने अपना पैतृक पेशा, मूर्तियों का बनाना किया, पर बाद में राजकीय नियमानुसार उन्हें भी सैनिक बनकर पचास वर्ष की आयु तक सेना के कर्तव्यों का पालन करना पड़ा था।

 वहाँ भी वे विवेक-बुद्धि से काम लेते थे और किसी पाप-कर्म में हाथ बँटाने को तैयार नहीं होते थे। सन् ४०४ (ईसवी पूर्व) में एथेन्स के तत्कालीन अध्यक्ष ने कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लेने की आज्ञा दी। पर सुकरात उनको निरपराध समझते थे, इसलिए उन्होंने इस आज्ञा को मानने से इनकार कर दिया। राजाज्ञा की अवज्ञा के कारण उनको भी प्राणदंड दिया जाता, पर उसी समय प्रजा ने उस शासक के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और इससे उस घटना का वहीं अंत हो गया।

उस समय सैनिक ही समाज के मुख्य अंग थे, इसलिए प्रत्येक बालक को आरंभ से ही व्यायाम करने और शस्त्र संचालन की शिक्षा दी जाती है। जिस प्रकार आजकल प्रत्येक बालक के लिए स्कूल जाकर पढ़ना-लिखना सीखना आवश्यक माना जाता है।

 इसके बिना उसका समाज में कोई मान नहीं होता और न वह सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है, उसी प्रकार उस समय सभी को व्यायामशालाओं में जाकर शरीर को खूब मजबूत और कष्टसहिष्णु बनाना पड़ता था और उस जमाने के हथियार तीर, तलवार, भाला आदि के प्रयोग का भरपूर अभ्यास करना पड़ता था।

 सुकरात भी इस नियम के अपवाद न थे, वरन् कहा जाता है कि व्यायाम में उनकी विशेष रुचि थी और उन्होंने उसके द्वारा अपने शरीर को इतना सुदृढ़ बना लिया था कि वह बड़े दुर्गम और कठिन प्रदेशों में भी अपनी अति सामान्य पोशाक में सब प्रकार के भले-बुरे मौसम को सहन करके अपना कर्तव्य अच्छी तरह पालन करते रहते थे।