सुकरात और उनकी पत्नी

 सुकरात और उनकी पत्नी

कुछ महापुरुषों की तरह सुकरात की गणना ऐसे व्यक्तियों में की जाती है, जिनकी पत्नी उनके प्रतिकूल स्वभाव की होती है। पर उन्होंने आजन्म उसको निबाहा और उसके साथ उदारता का व्यवहार किया। कहा जाता है कि उनकी पत्नी-जेथिप्पी चिड़चिड़े स्वभाव की और कर्कशा थी। उधर सुकरात अत्यंत शांत, प्रेमी स्वभाव वाले और सीधे-सादे थे। इसलिए इनके साथ लड़ते-झगड़ते रहना और तरह-तरह से तंग करना उसके लिए साधारण बात थी। उनके ऐसे गार्हस्थ जीवन के कई किस्से इतना समय बीत जाने पर भी आज तक प्रसिद्ध हैं।

एक दिन जेथिप्पी किसी बात पर सुकरात पर बहुत नाराज हो गई और बड़ी देर तक खूब बकती-झकती रही। पर सुकरात अपने स्वभाव के अनुसार शांत ही रहे और उन्होंने उसकी बातों पर कुछ भी ध्यान न दिया। इस पर उसका गुस्सा और भी भड़क उठा और उसने एक बर्तन में भरा मैला पानी उन पर फेंक दिया। 

पर सुकरात पर इसका भी कोई खास असर नहीं हुआ और उन्होंने हँसते हुए इतना ही कहा–'मैं तो पहले ही जानता था कि जेथिप्पी इतना गरजने के बाद बिना बरसे न रहेगी।" हमको यह भी याद रखना चाहिए कि सुकरात का अपनी पत्नी के प्रति यह उदार व्यवहार उस जमाने में था, जिसमें स्त्रियाँ भी पुरुषों की संपत्ति समझी जाती थीं और उनके साथ कैसा भी व्यवहार किया जा सकता था ?

सुकरात के गार्हस्थ-जीवन की इस घटना को पढ़कर हमको इससे मिलती-जुलती घटना याद आती है और वह भी उनके ही समान एक बहुत बड़े पुरुष की है। महाराष्ट्र के संत तुकाराम की स्त्री भी बड़ी लड़ाका और कर्कशा थी और तुकाराम से प्रायः झगड़ती रहती थी। एक दिन तुकाराम किसी अन्य गाँव से आ रहे थे तो किसी किसान ने उनको बहुत से गन्ने दे दिये। पर जब वे अपने गाँव में पहुंचे तो रास्ते में ही लड़के उनसे गन्ने माँगने लगे। वे उनको एक-एक गन्ना देने लगे, यहाँ तक कि घर पहुँचते-पहुँचते उनके पास केवल एक गन्ना रह गया।

 वह उन्होंने अपनी स्त्री को दे दिया। इस पर वह इतनी क्रोधित हो गई कि उसने गन्ने को उनकी पीठ पर दे मारा। गन्ना बीच से टूटकर दो टुकड़े हो गया। तुकाराम ने यह देखकर कहा-देवी जी, यह तो आपने बड़ा ठीक हिसाब लगाया। गन्ने के अब दो टुकड़े हो गये, एक तुम चूस लो और दूसरा मैं लिये लेता हूँ।"

एक बार जेथिप्पी ने बाजार में ही सुकरात से झगड़ा किया और उनका कोट फाड़ डाला। यह देखकर सुकरात के मित्र बड़े नाराज हुए और उन्होंने कहा कि जेथिप्पी को इसका दंड अवश्य दिया जाना चाहिए। पर सुकरात ने कहा-"जिस प्रकार सईस दुष्ट घोड़ों के साथ रहकर उन्हें ठीक करने का प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार मैं भी एक चिड़चिड़े स्वभाव वाली स्त्री के साथ रहता हूँ और जिस प्रकार यदि सईस उस दुष्ट घोड़े पर काबू पा लेता है तो अन्य घोड़ों को तो वह आसानी से वश में रख सकता है, उसी प्रकार जेथिप्पी के दुर्व्यवहार का मुकाबला करता हुआ में समस्त संसार का सामना करने का अभ्यास करता हूँ।

एक बार सुकरात के किसी मित्र ने इस प्रकार की घटनाओं को देखकर कहा कि-"जेथिप्पी का व्यवहार असहनीय है, आप कैसे उसे बरदाश्त करते हैं ?" सुकरात ने कहा-"जिस प्रकार आप अपनी पालतू बतखों की 'घे-घे' को सुनते रहते हैं, उसी प्रकार मैं भी इसकी बातों को सुनने का अभ्यस्त हो गया हूँ।" मित्र ने कहा-परंतु बतखें तो मुझे अंडे और बच्चे देती हैं।" सुकरात ने उत्तर दिया-"जेथिप्पी भी मेरे बच्चों की माँ है ।"


एक बात यह भी थी कि अपना अधिकांश समय निःस्वार्थ भाव से लोक-शिक्षण में लगा देने पर सुकरात के पास अपने जीवन निर्वाह की तरफ ध्यान देने को बहुत कम समय बचता था। इससे उनको सदैव बहुत गरीबी में समय व्यतीत करना पड़ता था। वे स्वयं अत्यंत सादगी के साथ रहते थे और भोजन के साथ अचार, चटनी, रायता जैसी जायकेदार' चीजों की कभी भी इच्छा नहीं रखते थे। एक बार कुछ धनी व्यक्तियों को उन्होंने भोजन के लिए आमंत्रित किया। जेथिप्पी ने भोजन के घटिया होने पर असंतोष प्रकट किया, तो सुकरात ने कहा-"अगर वे समझदार होंगे तो उन्हें इस सीधे-सादे भोजन में कोई खराबी नहीं जान पड़ेगी और यदि वे मूर्ख हैं तो मूर्खों के कथन से लज्जित होने की कोई बात ही नहीं। " इस प्रकार सुकरात तो अपने दार्शनिक ज्ञान और आत्म-नियंत्रण के कारण प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न और संतुष्ट रहते थे पर जेथिप्पी जैसी सामान्य स्त्री से इस प्रकार की आशा करना व्यर्थ थी। इस कारण से भी यदि उसकी कटुता में कुछ वृद्धि हो गई तो कोई आश्चर्य नहीं।

कुछ भी हो सुकरात ने अपना गार्हस्थ जीवन सुख-दुःख और असुविधाओं की परवाह न करके अच्छी तरह निबाहा, और जो लोग जरा-जरा-सी बातों पर तलाक की तैयारी करने लगते हैं अथवा अपने जीवन का अंत करके झंझटों से छुटकारे की कोशिश करते हैं. उनके लिए एक उत्तम उदाहरण छोड़ गया। अपने सांसारिक जीवन में भी उसने आध्यात्मिकता की महत्ता को सिद्ध करके दिखा दिया।

 वास्तव में आत्मज्ञानी की निगाह में संसार के जो छोटे-बड़े उतार-चढ़ाव एक खेल की तरह जान पड़ते हैं, वे ही धन तथा सुख के लिए मारे-मारे फिरने वाले भौतिकवादी के लिए जीवन-मरण के प्रश्न बन जाते हैं। यही कारण है कि संसार में सबसे अधिक धनी देश अमेरिका में प्रति वर्ष लाखों व्यक्ति आत्म-हत्या कर डालते हैं, जबकि करोड़ों लोगों को भर पेट रोटी भी न मिलने पर भारत में इस प्रकार अपने जीवन का अंत करने वालों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम है।