आत्म-बलिदानी की महिमा

 आत्म-बलिदानी की महिमा

यदि सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाय तो सुकरात का विषपान द्वारा मृत्युदंड एक प्रकार से उनका आत्म-बलिदान ही था उनको न्यायालय ने प्राणदंड के बदले में यह सुविधा दी थी कि अगर वे अपना उपदेश करना छोड़ दें अथवा अन्य किसी स्थान को चले जायें तो उनको मुक्त कर दिया जाएगा।

 साथ ही वहाँ ऐसा भी नियम था कि वे कुछ धन-दंड देकर भी प्राणदंड से बच सकते थे और उनके अनुयायी इसके लिए तैयार भी थे। उनके एक शिष्य ने तो प्राणदंड की आज्ञा होने के पश्चात् भी जेलर से मिलकर इस बात की व्यवस्था कर ली थी कि सुकरात चाहें तो चुपचाप जेल से निकलकर अन्यत्र चले जायें। पर सुकरात ने इनमें से किसी उपाय को अपने सिद्धांतों और चरित्र के अनुकूल नहीं समझा । उन्होंने अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य अपने समक लोगों को आध्यात्मिकता की ओर प्रवृत्त करना ही बना लिया था।

 अगर वे स्वयं किसी हीन उपाय द्वारा अपनी प्राण-रक्षा करने को उद्यत हो जाते, तो इससे आध्यात्मिकता के प्रति सर्वसाधारण की भावना निर्बल ही पड़ती। इसलिए उन्होंने भौतिकवादी मनोवृत्ति वालों के आक्षेपों और आक्रमण का वीरतापूर्वक मुकाबला किया और पूर्ण शांति तथा निश्चित भाव से अपने प्राण देकर यह सिद्ध कर दिया कि वास्तव में आध्यात्मिकता की शक्ति सर्वोपरि है। इस घटना से सुकरात के सिद्धांतों, आत्मा की अमरता संबंधी विचारों को जो बल मिला, वह हजारों भाषणों और ग्रंथों से मिल सकना संभव न था।

 उनके बलिदान ने भावना-जगत् में इतनी बड़ी क्रांति की, कि उसका प्रभाव समकालीन लोगों पर ही नहीं पड़ा, वरन् आज तक लोग उनसे प्रेरणा ले रहे हैं। उन्होंने अपने शिष्यों से, जो उनके वियोग की कल्पना से दुःखी हो रहे थे-ठीक ही कहा था

"सच्चे रास्ते पर कौन है, इसे अभी तो परमात्मा ही जानता है। पर जो कुछ मैं कहता हूँ, उसे कार्यरूप में परिणत कर दिखाने से समस्त संसार उसकी यथार्थता को अनुभव करने लगेगा और भावी पीढ़ियाँ उससे लाभ उठाती रहेंगी।"

एथेन्स के अनेक धनवान् और प्रभावशाली लोगों को अपने विरुद्ध एकत्रित देखकर और न्यायाधीशों को भी उन्हीं का साथी देखकर भी वे तनिक भी भयभीत नहीं हुए और उन्होंने भरी अदालत में उन सबको फटकारते हुए कहा-"क्या तुम्हें अपनी वैभवप्रियता और मान-सम्मान को पाने की लालसा पर लज्जा नहीं आती ? जबकि तुम्हें सत्य-मार्ग पर चलकर और ज्ञान प्राप्त करके अपनी आत्मा को पवित्र बनाने की तनिक भी चिंता नहीं है !" उन्होंने न्यायाधीशों द्वारा दिये गए मृत्यु-दंड की उपेक्षा करते हुए कहा-"मृत्यु के विषय में कुछ न जानते हुए भी उससे भयभीत होना उसी प्रकार व्यर्थ है, जिस प्रकार कुछ भी न जानते हुए अपने को ज्ञानी समझना।

 मुझे यह मालूम नहीं कि 'मृत्यु' क्या है ? वह एक अच्छी वस्तु भी हो सकती है, जबकि अपने सिद्धांत के विपरीत आचरण करना अवश्य ही बुरा है। इसलिए जो प्रत्यक्ष बुरा है उसकी अपेक्षा में संभावित अच्छी चीज (अर्थात् मृत्यु) को ही पसंद करूँगा। हो सकता है कि परमात्मा ने उसे मेरे कल्याण के लिए भेजा हो। मैं उसका हृदय से स्वागत करता हूँ।"