मनुष्यों के आदेश के बजाय भगवान् का आदेश मान्य

 मनुष्यों के आदेश के बजाय भगवान् का आदेश मान्य

वास्तव में सुकरात के ऊपर अभियोग चलाने का कारण यह था कि एथेन्स के कुछ लोग उसके आध्यात्मिक उपदेशों को अपने लौकिक जीवन के लिए हानिकारक समझते थे उसके उपदेशों को सुनकर बहुसंख्यक नवयुवक उसके अनुयायी बनते जाते थे और बाह्य कर्मकांडों की अपेक्षा उच्च आध्यात्मिक तत्त्वों को ज्यादा महत्त्व देने लगे थे।

 इसलिए उसके अभियोगकर्ताओं ने यही कहा कि या तो सुकरात अपना उपदेश देने का काम बंद कर दे या एथेन्स को छोड़कर अन्यत्र चला जाय, नहीं तो उसे मृत्यु दंड दिया जाय।

इसका उत्तर देते हुए सुकरात ने कहा-"यह तुम्हारा भ्रम है। जिस मनुष्य में थोड़ा-सा भी सत्य है, उसे मरने और जीने का गणित नहीं करना चाहिए। उसको तो केवल यही विचार करना चाहिए कि वह जो कुछ कर रहा है वह उचित है या अनुचित-उसका आचरण एक सज्जन मनुष्य जैसा है या एक दुर्जन मनुष्य के समान।

"अपने इस कथन में सुकरात ने स्पष्ट रूप से उसी सिद्धांत का उल्लेख किया है, जो भारतीय धर्मशास्त्रों में हजारों वर्ष पूर्व कहा जा चुका है। गीता में स्पष्ट कहा गया है कि -पंडित जन (ज्ञानी मनुष्य) जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं, उनके लिए भी शोक नहीं करते।" (गीता २-११)

 इसी प्रकार नीतिशास्त्र' के एक श्लोक में कहा गया है कि-"चाहे हमारा मरण आज हो जाय और चाहे हम युगों तक जीवित रहें, पर इसका विचार न करके ज्ञानी मनुष्य सदा न्याय मार्ग पर ही चलते रहते हैं।" इन्हीं सिद्धांतों को सत्य स्वीकार करते हुए सुकरात ने न्यायालय के सामने दृढ़ शब्दों में कहा

"जैसा कि मैं समझता हूँ, भगवान् मुझे आदेश दे रहे हैं कि अपने और दूसरे मनुष्यों के विचारों की जाँच-पड़ताल करके उस मार्ग का उपदेश करूँ, जो आध्यात्मिक जीवन की दृष्टि से श्रेयस्कर हो। अब यदि मृत्यु के भय से या किसी अन्य भय के वशीभूत होकर मैं अपना स्थान छोड़कर भाग निकलूँ, तो मेरा यह आचरण वास्तव में लज्जास्पद होगा।

 कारण, मृत्यु से भयभीत हो जाना तो ज्ञान नहीं, वरन् एक पाखंड अथवा अज्ञान है। एथेन्स के नागरिकों! आपको मेरे प्रति जो प्रेम है, उसके कारण आप यह कह सकते हैं कि 'सुकरात! जाओ, इस बार हम अभियोगकर्ताओं की बात को अनसुनी करके तुमको छोड़ देते हैं। किंतु तुमको यह वचन देना होगा कि तुम अब नगर के किसी व्यक्ति को अपने दार्शनिक सिद्धांतों का उपदेश नहीं करोगे और यदि ऐसा करते हुए पकड़े जाओगे तो तुम्हारा वध कर दिया जायेगा।

 अगर आप इस प्रकार की शर्त के साथ मुझे मुक्त करते हैं तो मेरा उत्तर यह है कि-एथेन्स के नागरिकों! मैं आप लोगों का सम्मान करता हूँ। आप लोगों से मुझे प्रेम है। पर आप लोगों की आज्ञा की अपेक्षा मैं भगवान् की आज्ञा का ही पालन करना श्रेयस्कर समझता हूँ। और जब तक मुझ में प्राण और कार्य करने की शक्ति है तब तक मैं दार्शनिक तत्त्वों का अध्ययन और उनका प्रचार करने से विमुख नहीं हो सकता।"

"मैं जिस किसी से भी मिलूँगा, उसी से अपने स्वभाव के अनुसार कहूँगा - बंधु! तुम एथेन्स के समान श्रेष्ठ, शक्तिसंपन्न तथा ज्ञान की दृष्टि से भी प्रसिद्ध नागरिक हो, तो क्या तुमको अपना आधिकाधिक ध्यान धन, मान तथा यश के लिए लगाते तथा ज्ञान, सत्य तथा आत्मा के सच्चे हित की अवहेलना करते हुए लज्जा नहीं आती ? इन विषयों का ध्यान और मनन तुम क्यों नहीं करते ?' यदि वह व्यक्ति कहेगा कि-"हाँ, मैं उनका मनन करता हूँ, तो भी उसी क्षण मैं उसको नहीं छोड़ दूंगा।

 मैं उससे और भी अनेक प्रश्न पूछूँगा, उसकी परीक्षा लूँगा, उसकी समीक्षा करूँगा और यदि मैं देखूँगा कि उसमें शील नहीं है, तो भी वह अपने शील होने का दावा करता है, तो मैं उसकी भर्त्सना करूँगा। मैं मुझसे मिलने वाले सब लोगों से इसी तरह की बातें करूँगा, चाहे वे लोग नवयुवक हों या वृद्ध; चाहे वे अपने देश के रहने वाले हों-चाहे परदेश के। हाँ, मेरा ध्यान

स्वदेशवासियों की तरफ अधिक जायेगा, क्योंकि वे मेरे बांधव हैं।" यद्यपि आज हम इस प्रकार दूसरों को उपदेश देने के लिए आतुर व्यक्तियों को प्रायः हँसी का ही पात्र समझते हैं, क्योंकि हमारे पास प्रचार के अन्य अनेक साधन जैसे-पुस्तकें, समाचार-पत्र, स्कूल, क्लब तथा विभिन्न प्रकार की संस्थाएँ मौजूद हैं।

 पर अब से दो-डेढ़ सौ वर्ष पूर्व हमारे देश में भी उपदेश का यही रास्ता था कि कुछ लोग किसी बड़े बाजार, घाट या मंदिर जैसे सार्वजनिक स्थान पर बैठकर मौखिक चर्चा करते रहते थे यदि किसी व्यक्ति को अपने सामाजिक या धार्मिक विचार अन्य लोगों में फैलाने होते थे तो वह ऐसी बाजार-गोष्ठियों में खड़े होकर अपनी बात सुनाया करता था।

 सुकरात के समय में, जिसे लगभग ढाई हजार वर्ष व्यतीत हो चुके, यह स्थिति और भी सीमित और कठिन थी। उस समय लिखने-पढ़ने का बहुत कम प्रचार हुआ था, संसार में कोई आजकल के समान कागज को जानता भी न था। बहुत आवश्यकता पड़ने पर चमड़े, कपड़े या लकड़ी आदि पर कुछ लिखा जाता था। ऐसी दशा में उस समय लोक शिक्षण और प्रचार का एकमात्र साधन वार्तालाप और भाषण ही था। अपने विचारों का प्रचार करने के निमित्त सुकरात को भी उसी-उसी का उपयोग करना पड़ता था।