खूब लड़ी मरदानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी।

 खूब लड़ी मरदानी वह तो, झाँसी वाली रानी थी।

इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि संसार में पूजा और प्रतिष्ठा, आत्मत्याग और बलिदान की ही होती है। भारतीय स्वाधीनता की 'सत्तावनी क्रांति में यद्यपि तात्या टोपे, कुँवरसिंह, नाना साहब आदि अनेक वीरों ने अँगरेजों से डटकर मुकाबला किया और अपने को स्वतंत्रता की वेदी पर बलिदान कर दिया, पर जिस तरह रानी लक्ष्मीबाई ने निशंक होकर शत्रु के सम्मुख युद्ध किया और बिना पीछे कदम हटाए तलवारों और बंदूकों के सामने निर्भय होकर बढ़ती चली गई, उसका उदाहरण उस समय के समस्त इतिहास में दूसरा नहीं मिलता।

 स्त्री होकर उसने वह काम कर दिखाया जो उस स्वतंत्रता संग्राम' में कोई पुरुष न कर सका । उसके इसी अनुपम शौर्य को देखकर सामान्य जनता भी मुग्ध हो गई और भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम' के नेतृत्व का मुकुट उसी के सिर पर रखा गया। शत्रु- पक्ष के विजयी सेनानायक सर ह्यूरोज ने भी विद्रोह के समस्त कर्त्ता-धत्ताओं में 'सच्चा मर्द' उसी को माना।

भारतीय स्त्री जाति की दृष्टि से तो वर्तमान समय में इतना महान आदर्श दूसरा मिल ही नहीं सकता। यह सच है कि हर एक स्त्री को न तो उसके समान वीरांगना बनने के साधन मिल सकते हैं और न इस प्रकार युद्ध करने का अवसर मिलने की ही आशा की जा सकती है, पर रानी लक्ष्मीबाई के उदाहरण में जो कुछ अनुकरणीय है, वह कर्त्तव्य-मार्ग से किसी भी स्थिति में पैर पीछे न हटाना है। कर्त्तव्यनिष्ठा प्रत्येक स्त्री और पुरुष के लिए एक ऐसा गुण है, जिसके होने पर वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में स्मरणीय कार्य करके अपना नाम चिरस्थाई कर सकता है।