सामाजिक अधिकार की महत्ता

 सामाजिक अधिकार की महत्ता


यद्यपि समाज के ही कुछ लोगों ने द्वेषवश सुकरात को प्राणदंड दिलाया, पर वह जीवन के अंतिम क्षण तक समाज के विरुद्ध कोई काम करने को तैयार न हुए। वरन् जब उनके मित्र क्रितॉन ने जेल से छिपकर निकल जाने की व्यवस्था कर दी, तब भी उन्होंने यही कहकर उसे अस्वीकार किया कि ऐसा करना समाज के प्रतिनिधि रूप 'राज्य' अथवा शासन' के प्रति अवज्ञा या विद्रोह प्रकट करना होगा जिस समाज ने हमको जन्म दिया, पाला-पोसा, शिक्षा प्रदान की और संसार में कुछ काम कर सकने योग्य बनाया, उसका किसी भी रूप में विरोध करना अनुचित है। उन्होंने स्वयं ही कल्पित करके इस प्रकार के समाज विरोधी विचारों के संबंध में एक वक्तव्य प्रस्तुत किया, जिसमें 'समाज' की तरफ से सुकरात से कहा गया

"सुकरात! अगर तुम राज्याज्ञा को अमान्य करके जेलखाने से बाहर निकल जाते हो तो इसका अर्थ यह होगा कि तुम उन नियमों तथा प्रतिज्ञाओं को भंग कर रहे हो जो तुमने हमारे साथ की हैं। उन सबका मनन और पालन तुम सत्तर वर्ष तक कर चुके हो। यदि वे नियम अथवा विधान तुमको अन्याययुक्त प्रतीत होते थे तो इस बीच में तुम एथेन्स को छोड़कर चाहे जहाँ चले जा सकते थे। पर तुम इस नगर के शासन-विधान में ऐसे अनुरक्त बने रहे कि तुमने कभी बाहर निकलने का विचार भी नहीं किया। अतएव अब यदि तुम इस नगर को छोड़कर इस प्रकार भागते हो तो निश्चय ही अपने को हास्यास्पद बनाओगे।"

"तनिक यह विचार करो कि यदि तुम इस प्रकार का विपरीत कार्य करते हो तो इससे अपना अथवा अपने मित्रों का कौन-सा हित करोगे ? यह तो निश्चित है कि ऐसा होने पर तुम्हारे मित्रों को निर्वासित किया जायेगा या नागरिकता से च्युत किया जायेगा अथवा उनकी संपत्ति जब्त कर ली जायेगी। फिर यदि तुम भागकर किसी समीप के राज्य में जाओगे भी तो वहाँ तुमको एक विदेशी की तरह ही देखा जायेगा और भगोड़ा समझकर घृणा की दृष्टि से देखा जायेगा।"

"अतः सुकरात ! हमारी बात पर ध्यान दो। हमने ही तुम्हारा पालन-पोषण किया है। इसलिए उचित यह है कि तुम 'धर्म' अथवा 'कर्तव्य' के सम्मुख अपने जीवन अथवा संतान की चिंता न करा। तुम्हें सबसे पहले 'धर्म' की ही चिंता करनी चाहिए, जिससे परलोक के राजा' (ईश्वर) के समक्ष तुमको निर्दोष समझा जा सके । पर यदि तुमने वह कार्य किया, जिसकी सम्मति तुमको तुम्हारे मित्र देते हैं, अर्थात् तुम जेल से भाग गये तो तुम इस जीवन में और परलोक में भी सुखी नहीं हो सकोगे।"

"इस समय तो तुम निर्दोष रहकर ही इस लोक से प्रयाण कर रहे हो। तुमने दुःख भोगा है, किंतु कोई पाप-कृत्य नहीं किया। तुम्हारा मरण भी राज्य द्वारा नहीं, कुछ विद्वेषी मनुष्यों द्वारा संपन्न किया गया है। किंतु यदि तुम पाप के प्रतिकार में पाप अहित के प्रतिकार में अहित करोगे तो तुम उन कर्तव्यों का घात करने वाले माने जाओगे, जो हमारे प्रति तुमको करणीय हैं।"

इस प्रकार सुकरात ने अपनी 'धर्म-बुद्धि' से उन सब तर्कों का उत्तर दे दिया, जो उनके मित्र या शत्रु उनके पक्ष या विपक्ष में पेश कर सकते थे। उसने यह सिद्ध कर दिया कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका निर्माण और निर्वाह एक मात्र समाज के आश्रय से ही होता है। इसलिए उसे किसी दशा में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए, जो समाज के विपरीत अथवा उसके लिए हानिकारक हो।

 सुकरात ने देखा कि आज भी एथेन्स के बहुसंख्यक व्यक्ति उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, उसे एक सच्चा और परमार्थी व्यक्ति मानते हैं, सैकड़ों मनुष्य उसके भक्त और अनुयायी हैं। ऐसी दशा में यदि कुछ मनुष्यों ने व्यक्तिगत या स्वभावगत मतभेद के आधार पर उसका अहित किया तो भी उसे ऐसा काम कदापि नहीं करना चाहिए, जिससे समाज में विशृंखलता उत्पन्न हो अथवा उसकी सत्ता के विरुद्ध अवहेलना का भाव लोगों में बढ़े। 

वर्तमान समय में यदि विचारपूर्वक देखा जाए तो मनुष्य, समाज के ऊपर पहले से कहीं अधिक आश्रित हो गया है सब प्रकार के साधनों तथा वैज्ञानिक जानकारी के बढ़ जाने से शिक्षा, चिकित्सा, सुरक्षा, परिवहन आदि अनेक जीवनोपयोगी विषयों में ऐसी सामूहिक सुविधाएँ उत्पन्न कर दी गई है, जो प्राचीन काल में लोगो को प्राप्त नहीं थीं। पर खेद का विषय है कि इस समय लोग और खास कर हमारे देश के निवासी अपने सामाजिक उत्तरदायित्व के संबंध में बहुत ही लापरवाह दिखाई पड़ रहे है। वे समाज या उसके प्रतिनिधि स्वरूप 'राज्य' द्वारा मिलने वाले लाभों को तो ईमानदारी या बेईमानी से जैसे भी हो अधिक से अधिक लेना चाहते हैं, पर उसके प्रति क्या कर्तव्य हैं ? इसका ध्यान वे कभी नहीं रखते।

इतना ही नहीं बहुसंख्यक व्यक्ति तो कानून द्वारा लगाये गए उत्तरदायित्वों से भी बचने की चेष्टा करते रहते हैं। यही सबसे बड़ी शोचनीय बात है, जिसके फल से आज समाज में अनेकानेक दोष उत्पन्न हो गये हैं। जिनके कारण सज्जन लोगों को कष्ट सहन करना पड़ता है और दुष्टजन उच्छृंखल जीवन व्यतीत करते हैं। इस संबंध में सुकरात का उपर्युक्त अभिमत हमारे लिए बहुत ही शिक्षाजनक और प्रेरणाप्रद है। उसने अपने प्राण देकर भी यह दिखला दिया कि मनुष्य अंततः समाज की ही संतान है और उसे कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जो उसके लिए अहितकर हो।