विद्रोही नेताओं की भूलें

 विद्रोही नेताओं की भूलें

यह एक आश्चर्य की ही बात थी कि झाँसी में इधर-उधर के सिपाहियों को इकट्ठा करके रानी लक्ष्मीबाई सर ह्यूरोज की सेना का १३ दिन तक अच्छी तरह मुकाबला करती रहीं, पर कालपी में उससे कहीं अधिक सुशिक्षित सेनाएँ और कई राजाओं तथा सरदारों के होने पर भी लड़ाई का फैसला एक दिन में ही हो गया और किले के भीतर भी विद्रोही सेना एक सप्ताह से अधिक न टिक सकी। इसका असली कारण था-नेतृत्व का अभाव और अनुभव की कमी। सच पूछा जाए तो कितनी ही विद्रोही-टुकड़ियाँ सेना नहीं थी, वरन केवल भीड़ थी।

 उनके संचालनकर्ता राजाओं और नवाबों ने कभी युद्ध देखा भी न था। सब आराम की गोद में पले हुए और महलों में गरम गलीचों पर पैर रखकर चलने वाले थे। उधर अँगरेजी सेनापति तथा अन्य अफसर पक्के सिपाही और युद्धविद्या के पूरे जानकार थे उनको अनेक रणक्षेत्रों का अनुभव था और वे सेना को पूर्ण नियंत्रण में रखना जानते थे। यही कारण है कि एक हजार सेना लेकर बीस हजार विद्रोहियों का मुकाबला करने को तैयार हो जाते थे और फौजी दाव पंचों के बल पर सफलता प्राप्त कर लेते थे।

रानी लक्ष्मीबाई स्त्री होते हुए भी इन बातों को बहुत कुछ समझती थीं। उसने कालपी आते ही राव साहब से कहा था कि बिना सुव्यवस्था और ठीक इंतजाम से हमारी जीत कभी नहीं हो सकती। प्रबंध की उत्तमता से ही झाँसी में अँगरेजी सेना की जीत हुई है। उसके अफसर अपने काम में बड़े चतुर थे। उनके सिपाही युद्ध के मैदान में हमेशा जी खोलकर लड़ते थे। उन सब पर एक अफसर रहता था और उसी की आज्ञा से सब काम होता था।

 अत: जब तक आपकी सेना का इंतजाम ठीक न करेंगे, तब तक अँगरेजों से कभी नहीं जीत सकते। राव साहब ने रानी सलाह की सराहना की और सेना को कई भागों में बाँटकर अलग - अलग उनकी ड्यूटी नियत की। पर वे स्वयं इस संबंध में अनुभवहीन थे और फिर भी राजा-रईसों के लड़कों की तरह अपनी योग्यता को बहुत अधिक समझते थे इसी झूठे अहंकार के कारण वे एकाध जगह थोड़ी सफलता मिलते ही फूल जाते थे और पेशवाई के सपने देखने लगते थे ।

 उन्होंने कई बार समय और साधन मिल जाने पर भी उनका उचित प्रबंध और उपयोग न किया, वरन समय और साधनों को ऊपरी शान शौकत दिखाने के लिए जलसे, उत्सव आदि में नष्ट कर दिया, इसीलिए उनको अधिकांश स्थानों पर असफलता का ही मुँह देखना पड़ा और एक विशेष परिस्थितिवश देश में उत्साह और स्वतंत्रता की जो लहर उत्पन्न हुई थी, वह बहुत थोड़ा फल दिखाकर ही समाप्त हो गई।

"अब इस मौके पर भी किसी नेता को यह नहीं सूझ रहा था कि आगे कौन सा कदम उठाने से हम अपनी स्थिति को मजबूत कर सकेंगे और एक बार फिर शत्रु का सामना करने की शक्ति प्राप्त कर सकेंगे, तब रानी लक्ष्मीबाई ने सम्मति दी कि अब कालपी या झाँसी पर अधिकार कर सकने की बात तो स्वप्नवत हो गई।

 फिर भी हमको किसी न किसी किले का आश्रय लेना ही पड़ेगा; इसके बिना युद्ध का संचालन कभी अच्छी तरह नहीं हो सकता। इसलिए सब बातों पर सोच-विचारकर मैं ग्वालियर के किले को हस्तगत करके अँगरेजों का मुकाबला करना ठीक समझती हूँ। वह सबसे मजबूत किला है। वहाँ की फौज दिल से विद्रोही हो चुकी है, जैसे ही हम वहाँ पहुँचेंगे, वह ग्वालियर नरेश का पक्ष छोड़कर हमसे मिल जाएगी।"

रानी की यह सलाह सबको पसंद आई और शीघ्र ही इसे कार्यान्वित करने के लिए सेना और युद्ध-सामग्री एकत्रित करके विद्रोही १ जून को ग्वालियर के निकट मोरार तक जा पहुचे। अब वहाँ के महाराज जीवाजी राव तथा उनके दीवान दिनकर राव बड़े संकट में पड़े। अभी तक वे बड़ी चतुराई से विद्रोहियों के दबाव को तैयार भी हुए थे, पर दिनकर राव ने ही उनको सब कुछ ऊँचा-नीचा समझाकर रोक रखा था। अब विद्रोही सेना के आक्रमण कर देने से उनको सामने आना पड़ा और सात-आठ हजार सेना लेकर मैदान में आए।

 ग्वालियर का तोपखाना प्रसिद्ध फ्रांसीसी सेनाध्यक्षों की देख-रेख में बनाया और संगठित किया गया था। उसकी शक्ति अब भी पर्याप्त थी। उसकी मार के सामने आरंभ में राव साहब की सेना के पैर उखड़ने लगे। यह देखकर रानी लक्ष्मीबाई ने एक सेना दल को लेकर ग्वालियर की सेना पर धावा किया और उसकी हिम्मत को तोड़ दिया। बहुत से सैनिक जो पहले ही ग्वालियर नरेश की अँगरेजों की तरफदारी की नीति से नाराज थे, उनका साथ छोड़कर विद्रोहियों से आ मिले। यह देखकर जीवाजी राव और दिनकर राव भाग खड़े हुए और आगरा पहुँचकर अँगरेजी सरकार की शरण ली।


अब राव साहब, लक्ष्मीबाई, तात्याटोपे आदि का ग्वालियर पर सहज में अधिकार हो गया। वहाँ का खजाना और सैन्य-सामग्री विद्रोही दल को मिल गई। ३ जून को राव साहब ने फूलबाग में बड़ी शान से दरबार किया, जिसमें सब सरदारों ने उनको पेशवा स्वीकार करके ताजीम की।

 इस अवसर पर उन्होंने खजाने का बहुत सा धन लोगों को बाँटने में बरबाद किया। इस समय भी प्रबल शत्रु की तरफ से लापरवाह रहकर उन्होंने पहली गलती को दोहराया। लक्ष्मीबाई ने उनको बहुत समझाया कि अब जबकि ग्वालियर राज्य के साधन प्राप्त हो गए हैं, तो सब काम छोड़कर उन सबका उपयोग अपनी रक्षा-व्यवस्था को मजबूत बनाने में करना चाहिए, क्योंकि अँगरेज अधिकारी चुपचाप नहीं बैठे रहेंगे। वे शीघ्र ही हम पर हमला करेंगे और हम उनका मुकाबला तभी कर सकेंगे, जब हर तरह से तैयार रहें। पर राव साहब इस समय विजयोत्सव में मगन हो रहे थे इस सलाह को सुनकर भी उन्होंने उस पर कुछ अमल नहीं किया।

१६ जून को ही सर ह्यूरोज की सेना मोरार के निकट आ पहुँची। एक विद्रोही सैन्य दल उसका मुकाबला करने को भेजा गया, पर वह दो ही घंटे में परास्त हो गया। ग्वालियर के विद्रोही सेना के कुछ अफसर रंग बदला देखकर फिर अंगरेजों से जा मिले।

यह दशा देखकर रानी जीवन-मरण का ध्यान छोड़कर रणक्षेत्र में कूद पड़ी। १७ जून को ग्वालियर से ५ मील के फासले पर 'कोटा की सराय' नामक स्थान पर भीषण संग्राम हुआ। रानी ने अपनी सेना की व्यूह रचना बड़ी चतुरता से की थी और वह मरदाने वेश में घोड़े पर सवार होकर स्वयं ही उसका नेतृत्व कर रही थी।

१७ जून को सुबह ही युद्ध का बिगुल बजा और घमासान युद्ध होने लगा। रानी की अलौकिक वीरता और अस्त्र संचालन की कला को देखकर सब वाह-वाह करने लगे, पर उसके सब साथी अँगरेजी सेना की गोली-वर्षा से घायल होते या मरते जाते थे। रानी का घोड़ा भी कई गोलियों लगने से भाग खड़ा हुआ। भागता हुआ वह एक सूखे नाले के किनारे जा पहुँचा और उसे फादने की कोशिश करते हुए पैर फिसल जाने से गिर गया। एक सवार ने जो पीछा कर रहा था शीघ्रतापूर्वक पहुँचकर रानी पर तलवार का वार किया, जिससे चेहरे का आधा भाग कट गया। फिर भी उसने साहस न छोड़ा और पीछे फिरकर एक ऐसा हाथ मारा कि वह भी उसी जगह गिरकर मर गया।

रानी के घावों से बहुत खून बह रहा था और उसका शरीर बराबर शिथिल होता जाता था। यह देख उनका एक सरदार उनको उठाकर पास ही बनी एक झोंपड़ी में ले गया। उसमें बाबा गंगादास नाम के साधु रहते थे। रानी को प्यास लगी, तो बाबा जी ने उन्हें गंगाजल पीने को दिया। कुछ देर बाद उन्होंने प्राण त्याग दिए।

 अगले दिन उनके शव को घास के एक बड़े ढेर में रखकर आग लगा दी गई, जिससे वह भस्मसात हो गया। अँगरेज अधिकारियों को उनके मरने की खबर कई दिन बाद मालूम हुई, जिससे वे मन मसोसकर रह गए। अन्यथा इस वीरांगना ने उनको जिस प्रकार नाकों चने चबवाए थे और अकेले ही न मालूम उनके कितने वीरों को मौत के घाट उतारा था, उससे वे उसके ऊपर बड़ा खार खाए बैठे थे। यदि वह जीवित या मृतक किसी प्रकार उनके हाथ पड़ जाती, तो वे उसकी अकथनीय दुर्दशा करते, पर वह सच्ची वीर और अपनी प्रतिज्ञा का पालन करने वाली थी।

उसने शत्रुओं का सामना होने पर भी कभी अपने प्राणों का मोह नहीं किया, इसीलिए वह अंत तक उनके चगुंल में न आ सकी।


किसी संस्कृत सुभाषित ग्रंथ में एक श्लोक दिया गया है कि सिंह चाहे दो-चार वर्ष ही जीवित रहे, पर उसके शौर्य की प्रत्येक प्रशंसा करता है। पर कौआ सौ वर्ष जीने पर भी सिवाय जूँठन के और किसी श्रेष्ठ वस्तु का अधिकारी नही होता। यह उक्ति रानी लक्ष्मीबाई के जीवन में पूर्णत: लागू होती है। यद्यपि वह केवल २४ वर्ष जीवित रही और इसमें भी जनता के सामने उसकी कार्यवाही केवल एक वर्ष के शासनकाल में प्रकट हुई, पर इसी बीच में उसने ऐसे काम कर दिखाए, जिनकी याद आज भी ताजा बनी हुई है और लाखों स्त्री पुरुषों को प्रेरणा दे रही है।


उसकी प्रशंसा केवल इस बात के लिए नहीं है कि वह शस्त्र संचालन में बड़ी निपुण थी अथवा अपूर्व साहसी थी। उससे बढ़कर तलवार चलाने वाले, युद्धक्षेत्र के बीच अकेले लड़ने वाले हजारों क्षत्रिय और राजपूत पिछले दो-चार सौ वर्ष में हो चुके हैं, उसकी विशेष प्रशंसा इस बात में है कि उसने आरंभ में से ही अपने सामने आने वाले प्रत्येक कर्त्तव्य को निस्स्वार्थ भाव से पूरा किया और अंत में मातृभूमि के प्रति अपने कर्त्तव्य को पालन करने में स्वेच्छापूर्वक प्राणोत्सर्ग कर दिया है।

 उनको अपनी अंतिम विजय की तो आशा थी नहीं और इधर विद्रोह के प्रमुख संचालकों की योग्यता और महत्त्वाकांक्षाएँ भी उनको इस महान अभियान के लिए अपर्याप्त जान पड़ीं, इसलिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ मार्ग यही समझा कि इस विकट अवसर पर ही अपना बलिदान करके तत्कालीन और भावी देशवासियों के सम्मुख एक प्रेरणाप्रद उदाहरण उपस्थित कर दें। एक ऐसे जीवन की सराहना और कामना कौन नहीं करेगा जिसने जीवित और मृत दोनों अवस्थाओं में मित्र, शत्रु और उदासीन सबकी प्रशंसा पाई हो और अंतिम क्षण तक कर्त्तव्यपालन पर आरूढ़ रहकर पूर्ण आत्मसंतोष प्राप्त किया हो।