सुकरात और महात्मा गांधी

 सुकरात और महात्मा गांधी

 महात्मा गांधी सुकरात के बड़े प्रशंसक थे और उन्होंने उसके संबंध में गुजराती में एक पुस्तक "एक सत्यवीरनी कथा" नाम की लिखी थी। संयोग की बात है कि उनका अंत भी ठीक सुकरात के ढंग पर ही हुआ, अर्थात् उन्होंने भी अपने सिद्धांत की रक्षा और उसके अभिवर्धन के लिए प्राणों का बलिदान कर दिया। इन दिनों जमाना बदल गया है, इसलिए न्यायालय द्वारा तो उनको मृत्युदंड देना संभव न हो सका, पर विरोधी विचार वालों ने उनको गोली से मार ही दिया।

 सुकरात को जहर का प्याला पिलाने वालों ने सोचा था कि सुकरात को मार देने से अध्यात्मवाद का प्रचार रुक जायेगा, पर रुकने के बजाय वह दिन पर दिन बढ़ता ही चला गया और उसने मनुष्यों के विचारों में इतना परिवर्तन तो कर ही दिया कि अब उन बातों पर किसी को सुकरात की तरह न्यायालय में मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता। इसी प्रकार गांधी जी ने सांप्रदायिक एकता अथवा मनुष्य मात्र को एक ही ईश्वर का बनाया हुआ सिद्ध करने के लिए अपने प्राण दे डाले। उनके बलिदान के फल से मुसलमान भी भारत के एक अंग बनकर इस देश में टिके रह सके। अन्यथा उनके हत्यारे तो यही सोच रहे थे कि महात्मा गांधी का अंत करके सांप्रदायिक एकता का भी अंत कर डालेंगे। इस प्रकार के हत्याकारियों की दृष्टि बहुत सीमित होती है और वे अपने जघन्य कृत्य के दूरवर्ती परिणाम को देखने में समर्थ नहीं होते।

इतिहास में ऐसे उदाहरण केवल ये दो ही नहीं हैं, वरन् और भी कितने ही पाये जाते हैं। महात्मा ईसा को जरूशलम के न्यायाधीशों ने गरीबों का पक्ष लेने पर 'क्रास' (सूली) पर लटका दिया, पर इससे उनके सिद्धांतों का अंत नहीं हो गया, वरन् आज आधी दुनिया उनके सामने मस्तक झुकाती है। अमेरिका के प्रेसीडेंट अब्राहम लिंकन को दास-प्रथा के समर्थकों ने मरवा दिया, पर इसके बाद भी दास प्रथा की जड़ जमी न रह सकी और आज संसार में उसका एक समर्थक नहीं है।

 रूस के महापुरुष लेनिन को भी गरीबों का उद्धारकर्ता होने के कारण गोली से मारा गया, पर आज लेनिन का सिद्धांत भी संसार के बहुत बड़े भाग पर छाया हुआ है। कुछ वर्ष पूर्व ही हब्शी-समस्या के लिए अमेरिका के प्रेसीडेंट कैनेडी और डॉ० लूथर किंग के प्राण इसी प्रकार लिए गए । पर हब्शियों को समान अधिकार दिये जाने का आंदोलन इन घटनाओं से रुक जाने के बजाय दिन पर दिन बढ़ ही रहा है और अब उसने अमेरिका ही नहीं समस्त संसार के हब्शियों के मुक्ति-आंदोलन का रूप ले लिया है।

ये सब उदाहरण इस बात को बतलाते हैं कि यद्यपि स्वार्थी और दुष्ट व्यक्ति सदा से सत्य और न्याय के प्रचारकों को मारने, नष्ट करने का प्रयत्न करते आये हैं, पर 'साँच को आँच कहाँ' वाले सिद्धांत के अनुसार अंत में विजय सत्य की ही हुई है। ये उदाहरण समस्त समाजसेवियों, परमार्थगामियों और न्याय के समर्थकों को साहस प्रदान करते हैं कि वे सामयिक कठिनाइयों से भयभीत न हों, उनकी सफलता निश्चित है। सत्य के सामने झूठ और न्याय के सम्मुख अन्याय अधिक समय तक नहीं ठहर सकता।