कालपी पर चढ़ाई और भयंकर युद्ध

 कालपी पर चढ़ाई और भयंकर युद्ध


कालपी में विद्रोहियों के एकत्रित होने के समाचार जानकर सर ह्यूरोज भी उस पर आक्रमण की तैयारी करने लगे। उन्होंने अपनी सेना का पुनर्संगठन किया, लड़ाई का नया सामान मँगाया और १५ मई को कालपी से ६ मील के फासले पर गुलौली गाँव में जा पहुँचे। जमुना के ऊबड़-खाबड़ कगारों पर बना यह किला प्राकृतिक रूप से ही बहुत सुरक्षित था, फिर नगर के बाहर चौरासी गुंबद नामक किलेबंदी और सुदृढ़ परकोटे ने उसको और भी मजबूत बना रखा था।

 किले के भीतर सब प्रकार के अस्त्र शस्त्रों तथा गोला-बारूद का विशाल भंडार था और यहीं से आस-पास के समस्त विद्रोही केंद्रों को युद्ध-सामग्री भेजी जाती थी। उसके भीतर तोप, बंदूक ढालने का कारखाना भी था और उसकी मरम्मत के सब औजार इकट्ठे किए गए थे। खाद्य-सामग्री का एक बड़ा गोदाम भी यहीं पर था।

कालपी के इस महत्त्व को अँगरेज अधिकारी और विद्रोही नेता-दोनों ही अच्छी तरह जानते थे। इसलिए राव साहब ने इसकी रक्षा के लिए चारों तरफ विभिन्न सेना दलों को नियुक्त किया था। एक ओर की सेना के अध्यक्ष बाँदा के नवाब थे, दूसरी ओर बरेली से आई हुई रुहेलों की पलटन थी, तीसरी ओर बंगाल नेटिव इन्फेंटरी की विद्रोही सेना को रखा गया था। रानी लक्ष्मीबाई के साथ लाल वर्दी वाले २५० घुड़सवार स्वतंत्र रूप से उत्तर की तरफ रखे गए थे।

 तारीख १५ मई को विद्रोहियों के एक दल से अंगरेजी सेना की मुठभेड़ गुलौली के पास ही हुई। आरंभ में विद्रोही सेना को कुछ सफलता मिली, पर बाद में जब अंगरेजी सेना की अग्निवर्षा ज्यादा तेज हुई तो वह पीछे हट गई। लक्ष्मीबाई को जब अपनी फौज की पराजय का हाल मालूम हुआ तो वह अपनी लाल वर्दी सेना के साथ युद्धभूमि की तरफ झपटी और अंगरेजी फौज पर बंगाल की तरफ से हमला किया। उसकी मार से अँगरेजी सेना में हलचल मच गई।


रानी स्वयं घोड़े की लगाम दाँतों के बीच दबाए दोनों हाथों से तलवार चलाकर शत्रुओं का सफाया कर रही थी। उसकी अभूतपूर्व वीरता को देखकर पीछे हटने वाली विद्रोही सेना को अपनी निर्बलता पर लज्जा आई और वे दूने जोश से अँगरेजी सेना पर टूट पड़े। अंगरेजी सेना को संकट में देखकर सर ह्यूरोज और ब्रिगेडियर स्टुअर्ट ने ऊँट सवार फौज के एक दल को साथ लेकर कालपी की फौज पर भयंकर आक्रमण किया। उनकी गोली वर्षा को विद्रोही सेना सहन न कर सकी और पीछे हटकर किले के भीतर चली गई।

 अब दोनों अँगरेजी सेनापतियों ने एक-एक सेनादल के साथ दोनों तरफ से कालपी पर आक्रमण किया। विद्रोही सेना ने चार पाँच दिन मुकाबला किया भी, पर उनका साहस प्रथम बार हो टूट चुका था। अब कालपी में ठहरना ठीक न समझकर राव साहब और लक्ष्मीबाई कुछ लोगों को साथ लेकर वहाँ से निकल गए और कुछ दूर जाकर गोपालपुर में ठहरे। दो-चार दिन बाद तात्याटोपे भी, जो कालपी से अपने पिता को देखने चले गए थे, वहाँ आ पहुँचे और सब मिलकर आगामी कार्यक्रम पर विचार करने लगे।