झाँसी की लूट

 झाँसी की लूट

 जब रानी कालपी चली गई तो अन्य सैनिक भी, जो शेष बचे थे वहाँ से बाहर निकलकर विभित्र दिशाओं में चल दिए। इस प्रकार झाँसी नगर को सर्वथा अरक्षित पाकर अंगरेज सैनिकों ने लूटमार आरंभ कर दी।

 जो नागरिक दिखाई पड़ जाता उसे मार दिया जाता और घरों में आग लगा दी जाती। महल में से तमाम कीमती वस्तुएँ और आभूषण लूट लिए गए। राजकीय पुस्तकालय को भी जला दिया गया। इस पुस्तकालय में बहुत से हस्तलिखित दुर्लभ ग्रंथ दूर-दूर से इकट्ठे किए गए थे, उन सबको अविवेकी सैनिकों ने कुछ ही घंटों में भस्म कर दिया।

लूट के बहुत से माल को छावनी में लाकर प्रतिदिन नीलाम किया जाता था। इसको लेने के लिए अंगरेजों के खुशामदी राजा और रईसों की भीड़ इकट्ठी हो जाती थी। ग्वालियर वालों ने भी बहुत सा सामान खरीदा।

 तीन दिन तक गोरे सैनिकों द्वारा लूट कराने के पश्चात अँगरेजी सेना में काम करने वाले भारतीय सिपाहियों को लूटने का आदेश दे दिया गया। उन्होंने भी प्रजा के घरों को मनमाना लूटा। सात दिन तक वह इस तरह लूटमार होने के पश्चात फौज को नगर से हटा दिया गया। इस नर संहार में हजारों निर्दोष नागारिक जान से मारे गए और घायल हुए।