देश में विद्रोह की अग्नि

 देश में विद्रोह की अग्नि



 सन् १८५७ के जनवरी मास से ही भारतीय फौजों में अँगरेजी अधिकारियों की कार्यवाहियों के विरुद्ध असंतोष प्रकट हो रहा था। इसका तात्कालिक कारण तो बंदूकों के लिए नए ढंग के चरबी से चुपड़े कारतूस देना था, पर वास्तविक कारण तरह-तरह की चालों से देश में अँगरेजी सत्ता का अधिकाधिक विस्तार किया जाना था। 

इससे यहाँ के कितने ही प्रधान व्यक्ति अंगरेजों के विरोधी बन गए थे, जिनमें बिठूर निवासी नाना साहब प्रमुख थे। जब उनकी ८ लाख वार्षिक की पेंशन अन्यायपूर्वक रोक दी गई और झाँसी तथा अवध जैसे राज्यों को भी उन्होंने अँगरेजों द्वारा जब्त किए जाते देखा, तो उनके हृदय में भारत के देशी राजाओं के संगठित करके अँगरेजों को मार भगाने की भावना उत्पन्न होने लगी। पहले तो उन्होंने इस संबंध में कई बार सब राजाओं को पत्र लिखे और फिर तीर्थयात्रा का बहाना करके सब जगह स्वयं राजाओं से मिले और उनसे इस संबंध में साँट-गाँठ की। अवध की राजधानी लखनऊ में तो हाथी पर उनका बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया।

सब लोगों से गुप्त रूप से विचार-विमर्श करके जून १८५७ में विद्रोह आरंभ करने की तिथि तय की गई। पर भारतीय फौजों में असंतोष अधिक बढ़ जाने से मेरठ के सिपाहियों ने १० मई को ही क्रांति का श्रीगणेश कर दिया और वहाँ के समाचारों से कानपुर, झाँसी आदि सब स्थानों की देशी सेनाओं में उत्तेजना फैल गई। यद्यपि अँगरेज अधिकारी यह नहीं जानते थे कि क्रांति की योजना भीतर ही भीतर कितनी अधिक फैल चुकी है? फिर भी वे सावधान हो गए और अपने स्त्री-बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया।

कानपुर और झाँसी में विद्रोह का आरंभ एक ही दिन ४ जून १८५७ की हुआ। कानपुर में पूर्वनिश्चित योजना के अनुसार ठीक आधी रात को तीन फायरों के संकेत देकर अँगरेजों के विरुद्ध युद्ध घोषणा की गई। उधर झाँसी में भी ४ जून को ही सेना के प्रधान अफसर कप्तान डनलप और टेलर को डाकखाने से लौटते समय रास्ते में ही मार दिया गया। इन विद्रोहियों के नेता रिसालदार कालेखा और तहसीलदार अहमद हुसैन थे। उन्होंने ८ तारीख को झाँसी के किले पर भी अधिकार कर लिया और उसके भीतर अपनी रक्षा के लिए एकत्रित ७४ अँगरेज पुरुष, १६ स्त्रियों और २३ बालकों को मौत के घाट उतार दिया उसके बाद उन्होंने रानी के महल को घेर लिया और खरच के लिए धन माँगा।

 रानी ने कहा कि मेरे पास नकद रुपये तो नहीं है, कुछ आभूषण दे सकती हूँ। अंत में एक लाख के कीमत के गहने देकर रानी ने उनको संतुष्ट किया। इसके पश्चात समस्त विद्रोही सेना "खल्क खुदा, मुल्क बादशाह का, अमल महारानी लक्ष्मीबाई का" नारा लगाते हुए दिल्ली की तरफ रवाना हो गए।