झाँसी का युद्ध

झाँसी का युद्ध

जैसा ऊपर बताया जा चुका है, झाँसी का शासन-भार रानी लक्ष्मीबाई ने विशेष परिस्थितियों में ही सँभाला था और वह शांति स्थापना के बाद उसे अँगरेज अधिकारियों के सुपुर्द करने को तैयार थीं; क्योंकि उन्हें अच्छी तरह ज्ञात था कि भारत का बड़े से बड़ा राजा भी युद्ध में अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध अधिक समय तक नहीं टिक सकता, पर उस समय के उत्तेजनापूर्ण और अविश्वास के वातावरण में उसकी सद्भावनाएँ कुछ भी काम नहीं आईं और अँगरेजों ने उसकी गिनती भी प्रधान विद्रोही नेताओं में कर ली।

 इसलिए जब आरंभिक पराजय के पश्चात अँगरेज अधिकारियों के पैर कुछ सँभले और इंगलिस्तान से नई सेनाएँ आ जाने से उन्होंने विद्रोह के सरदारों को एक-एक करके कुचलना आरंभ किया, तो सर ह्यूरोज और सर राबर्ट हैमिल्टन के नेतृत्व में एक सुदृढ़ सेना महू (इंदौर) की छावनी से रवाना हुई और सिहोर, रोहतासगढ़, बरोदिया, सागर, सनोड़ा, गढ़ाकोटा, मदनपुर आदि स्थानों में विद्रोहियों को अधीन करती हुई १९ मार्च, १८५८ को झाँसी से १४ मील के फासले पर चंचनपुर नामक स्थान में पहुँचकर उसने अपना कैंप लगाया।

२० मार्च को प्राप्त:काल ही सर ह्यूरोज अपनी सेना सहित झाँसी के समीप पहुँच गए। उनके सिपाहियों की संख्या तो कम थी, पर वे नए हथियारों से सुसज्जित, अनुभवी और अनुशासित थे। इधर रानी ने भी उनका मुकाबला करने की जोरदार तैयारियाँ की थीं। झाँसी का किला एक छोटी पहाड़ी पर बना हुआ बहुत मजबूत था । उसकी पत्थर और चूने से बनी दीवारों की मोटाई १६ से २० फुट तक है। 

बीच बीच में तोपों के रखने के लिए बुर्ज बने हैं। 'गरगज' नाम का बुर्ज सबसे बड़ा, २० गज लंबा और चौड़ा तथा ६० गज ऊँचा था। उसके चारों तरफ तोपें लगी हुई थीं, जिनमें कड़क बिजली 'घनराज' 'भवानी शंकर' 'नालदार' आदि नाम वाली कई तोपें बहुत प्रसिद्ध थीं। शहर के चारों ओर भी एक मजबूत परकोटा था, जिसमें ५ बड़े फाटक थे और स्थान स्थान पर बुर्ज भी थे जिन पर तोपें रखीं थीं।


जिस समय रानी और अँगरेजों का युद्ध आरंभ हुआ उस समय किले और नगर में कुल मिलाकर ११ हजार सेना थीं। इसमें अंगरेजी फौजों के बागी सिपाही, नए भरती किए हुए जवान और पुराने नागा सैनिक सभी सम्मिलित थे रानी ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए झाँसी के आस-पास के इलाके में न तो अन्न का एक दाना और न एक पत्ता रहने दिया था, जिससे आक्रमणकारी सेना को सहायता मिल सके, पर ग्वालियर और ओरछा के राजाओं ने अंगरेजी सेना के लिए रसद की पूरी व्यवस्था कर दी।

झाँसी का युद्ध २३ मार्च से आरंभ हुआ और १३ दिन तक रानी अंगरेजी सेना का डटकर मुकाबला करती रही। जहाँ कालपी, कानपुर और ग्वालियर के प्रसिद्ध किले और विद्रोहियों के केंद्र अँगरेजी सेना ने पाँच-पाँच, सात-सात दिन में जीत लिए, वहाँ झाँसी में अकेली रानी का इतने अधिक समय तक डटे रहना कम महत्त्व की बात नहीं थी। कारण यही था कि वह प्राणों की ममता त्यागकर निर्भयता से युद्ध कर रही थी। वह प्रत्येक महत्त्वपूर्ण स्थान पर स्वयं पहुँचकर युद्ध का संचालन करती थी और सिपाहियों को शाबासी और प्रेरणा देकर उनके उत्साह को बढ़ाती रहती थी। जब अँगरेजी तोपों की गोलाबारी से किले की दीवार एक स्थान पर टूट गई, तो रानी के नेतृत्व में स्त्रियों और बच्चों ने घंटों तक परिश्रम करके उसकी मरम्मत कर दी। ये स्त्री-बच्चे ही युद्ध-स्थल पर तैनात सिपाहियों को भोजन सामग्री पहुँचाते थे।

रानी ने अपनी सहायता के लिए नाना साहब के सेनाध्यक्ष तात्या टोपे को बुलाया। वह एक बड़ी सेना और २८ तोपों को लेकर लड़ने भी आए। पर अँगरेजी तोपों और बंदूकों की अग्निवर्षा के सामने उनकी सेना के पैर कुछ ही घंटों में उखड़ गए और अपने केंद्रस्थान कालपी को चले गए। झाँसी वाले फिर भी अंगरेजों का मुकाबला करते रहे। तारीख १ अप्रैल से सर ह्यूरोज ने अपना हमला तेज किया और दूसरी तारीख को किले की दीवार कई जगह से टूट गई अब ३ तारीख को अंगरेजी सेना ने किले पर अंतिम धावा बोला और टूटी हुई दीवार पर सीढ़ियाँ लगाकर चढ़ने का प्रयत्न किया। रानी की सेना ने भी प्राणपण से इनका प्रतिरोध किया और इस अवसर पर जैसा विकट संग्राम हुआ, वह अपने ढंग का अद्भुत ही था उसका वर्णन करते हुए अँगरेजी सेना के एक अफसर डॉ० लो ने लिखा है


"शत्रुओं की अग्नि की मार अत्यंत प्रबल हो गई। बंदूक की गड़गड़ाहट, तोपों की गरज, अग्निबाणों की सरसराहट और भड़क बड़े-बड़े पत्थरों के गिरने की धमक, शैतानी-चखों की खड़खड़ाहट तथा बड़े भारी वृक्षों के नीचे लुढ़कने की ध्वनि से ऐसी प्रलय कांड की सी अवस्था उत्पन्न हो गई कि एक बार अँगरेजी सेना के पैर उखड़ गए और वे पत्थरों के पीछे जा छिपे। कुछ देर बाद सँभलकर वे फिर आगे बढ़े और प्राणों की ममता त्यागकर सीढ़ियों द्वारा किले के ऊपर पहुँचने का प्रयत्न करने लगे। इनमें से बहुतों के प्राण चले गए। कुछ गोली का शिकार हुए, कुछ ढकेल दिए गए और कुछ की गरदन उड़ा दी गई।

 दोनों ओर से अनुपम वीरता, बलिदान और साहस के दृष्टांत देखने में आए। अंत में अँगरेजी झंडा किले पर लगा दिया गया, तब अँगरेजी सेना की एक टुकड़ी ने नगरस्थित राजमहल पर धावा बोला। सड़कों पर एक-एक कदम पर युद्ध हुआ और अँगरेजी सिपाहियों को जलते हुए मकानों के बीच से गुजरना पड़ा। महल के द्वार, चौक और प्रत्येक कमरे में उनका डटकर मुकाबला किया गया जब तक महल के सब रक्षक न मारे गए, तब तक अँगरेज महल पर कब्जा न कर सके। फिर अस्तबल में भी भयंकर संग्राम हुआ, जिसने रानी के ५० अंगरक्षकों ने वीरगति पाई।"

इस समय रानी की वीरता को देखकर समस्त झाँसी अँगरेजी सेना की विरोधी बनी थी और जनता के हजारों पुरुष, स्त्री, बच्चे भी किसी न किसी तरह इस संघर्ष में रानी का साथ दे रहे थे। पर जब ३ अप्रैल को किले और महल दोनों पर शत्रु का अधिकार हो गया तो सरदारों और मंत्रियों की सलाह से यह तय किया गया कि अब कालपी पहुँचकर अन्य विद्रोहियों के साथ मिलकर अंगरेजों का मुकाबला किया जाए। ४ अप्रैल को दो सौ सिपाहियों को साथ लेकर रानी उत्तरी दरवाजे से बाहर निकली और कालपी की तरफ चल दीं। इस तरफ अँगरेज ठीक तरह नाकेबंदी नहीं कर पाए थे। रानी ने इस समय मरदानी पोशाक पहन रखी थी। शरीर पर अँगरखा, पैरों में पाजामा, सिर पर साफा, कमर में तलवार धारण कर अपने सफेद घोड़े पर सवार, वह एक नवयुवक की तरह ही जान पड़ती थी। अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को उसने अपनी पीठ पर पटके से बाँध रखा था।


जब अँगरेज अधिकारियों को रानी के बाहर निकल जाने का पता लगा तो उन्होंने कुछ सवार कप्तान वॉकर की अध्यक्षता में उसे पकड़ने को भेजे। झाँसी से २१ मील की दूरी पर भाँडेर के पास बॉकर रानी के पास पहुँचा। रानी अपना घोड़ा लौटाकर उससे टक्कर ली और धराशायी कर दिया। झाँसी से कालपी की दूरी १०२ मील है। इसे रानी ने २४ घंटे में पार कर लिया। उस समय नाना साहब के भतीजे राव साहब, तात्याटोपे, बाँदा के नवाब आदि पर वहीं पर एकत्रित थे। वे सब रानी को देखकर बहुत प्रसन्न हुए और सब मिलकर अँगरेजों से लड़ने की योजना बनाने लगे। वानपुर, शाहगढ़, जिगनी आदि के राजा भी अपनी सेनाएँ लेकर कालपी आ गए और उस समय वह विद्रोहियों का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।