लक्ष्मीबाई का वैवाहिक जीवन

 लक्ष्मीबाई का वैवाहिक जीवन



जिस समय लक्ष्मीबाई की आयु ८ वर्ष की हुई तो उनके पिता जाति प्रथा के अनुसार उनके विवाह की चिंता करने लगे। जब कानपुर में किसी से बातचीत पक्की न हुई, तो बाहर की खोज करने लगे। इसी समय झाँसी के राजा गंगाधर राव के लिए भी वधू होने के लायक कन्या की खोज की जा रही थी। इस कार्य के लिए आने वाले सरदारों को लक्ष्मीबाई उपयुक्त जान पड़ी और जिस वर्ष गंगाधर राव झाँसी के राज सिंहासन पर आसीन हुए, उसी वर्ष उनका विवाह-संस्कार लक्ष्मीबाई के साथ संपन्न हो गया।

झाँसी का प्रांत पहले बुंदेलखंड के सुप्रसिद्ध शासक महाराज छत्रसाल के अधिकार में था। उन्होंने उसे पूना के पेशवा बाजीराव (प्रथम) को उनकी सैनिक सहायता के उपलक्ष्य में भेंटस्वरूप दे दिया था। सन् १७५६ में नागा साधुओं के गुरु इंद्रगिरी ने उस पर अधिकार कर लिया। पर बाजीराव उसको इस तरह छोड़ने वाले नहीं थे। उन्होंने अपना एक सरदार कुछ सेना के साथ झाँसी भेजा जिसने इंद्रगिरी को पूर्णरूप से पराजित कर दिया। 

उस समय झाँसी में इन नागा संन्यासियों के ४ मठ थे, जिनमें एक-एक हजार युद्ध कर सकने लायक साधु निवास करते थे। इन सबको प्रति मास चार रुपया राज्य की तरफ से मिलता था और इनका कर्त्तव्य था कि जब कभी युद्ध आरंभ हो तो वह स्वयं मोर्चे पर पहुँच जाएँ। ये नागा-संन्यासी अधिकतर धनुष-बाण से लड़ते थे। मराठा सूबेदारों ने भी इन चारों सैनिक संगठनों को, जिनका नाम 'आहंत', 'आभात', आखात' और 'नाखात' था, कायम रखा; ताकि समय पड़ने पर इसको युद्ध-क्षेत्र में भेजा जा सके। सन् १८५७ के विद्रोह में इन नागाओं ने भी लड़ने में प्रमुख भाग लिया था। कुछ समय बाद बाजीराव ने रघुनाथ हरी नेवालाकर को झाँसी

का सूबेदार नियुक्त किया। ये एक वीर और सुयोग्य शासक थे और सन् १७७० से १७९४ तक २४ वर्षों में उन्होंने झाँसी के राज्य की इतनी उन्नति की और वहाँ पर पेशवा के शासन को इतना सुदृढ़ बना दिया कि उससे प्रसन्न होकर रघुनाथ हरी को ही झाँसी का ही पुश्तैनी सूबेदार बना दिया। जब वे अधिक वृद्ध हो गए तो उन्होंने सूबेदार के पद पर अपने भाई शिवराव भाऊ को नियुक्त कर दिया और स्वयं काशी वास करने को चले गए।

 इन्हीं शिवराव ने सन् १८०४ में लार्ड लेक के प्रयत्न से अँगरेजी सरकार ने एक सुलहनामा लिख दिया था, जिसमें कहा गया था-"शिवराव भाऊ और कंपनी की सरकार आपस में सच्चे मित्र हैं और वे किसी भी आपत्ति के समय एकदूसरे की सहायता करने को तैयार रहेंगे।" साथ ही यह भी था कि अब तक झाँसी के सूबेदार पेशवा सरकार के मातहत माने जाते हैं, उनका वह संबंध भी कायम रहेगा।

 यद्यपि यह सुलहनामा प्रत्यक्ष में निर्दोष जान पड़ता है, पर लार्ड लेक की इस कूटनीति का यह परिणाम हुआ कि झाँसी के उदाहरण देखकर बुंदेलखंड के अन्य समस्त राज्यों ने भी एक के बाद एक अँगरेज शासकों से समझौता कर लिया। जो राजा इसे अपनी स्वतंत्रता के लिए हानिकारक मानते थे, उनको भी अपनी सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा ही करना पड़ा। कुछ समय बाद जब अंगरेजों ने पेशवा बाजीराव (द्वितीय) को दबा लिया तो उससे संधि करते समय यह शर्त भी लिखा ली-"हमारी मातहती में झाँसी जैसे दूरवर्ती इलाके हैं, उन सब पर हम अपना अधिकार छोड़ते हैं।

 यद्यपि पेशवा का शासन निर्बल पड़ जाने से ये सब 'सूबेदार' स्वयं ही पूर्ण स्वतंत्र राजा बन गए थे और पेशवा को किसी प्रकार का वार्षिक कर देना उन्होंने बंद कर दिया था, तो भी नाममात्र के लिए वे 'पेशवाई' के अधीन अवश्य थे। पर चालाक अँगरेजों ने इस शर्त द्वारा उनको पेशवा के बंधन से मुक्त करके अपने साथ किसी भी प्रकार की 'संधि' कर सकने की स्थिति में ला दिया। अँगरेजी सरकार के साथ संधि न कर सकने का एक बहाना था, उसे भी दूर कर दिया गया।

शिवराव भाऊ का देहांत १८१५ में हो गया। उसके बाद उनका पौत्र रामचंद्र राव सूबेदार हुआ और १८३५ तक शासन करता रहा। उसका देहांत होने पर उसके कई वर्ष तक शासन में शीघ्रतापूर्वक परिवर्तन होते रहे और ४ वर्ष तक अँगरेज सरकार ने अपना प्रतिनिधि झाँसी में रखकर, वहाँ का शासन कार्य चलाया। इसके पश्चात बहुत सोच-विचारकर लक्ष्मीबाई के प्रति गंगाधर राव को, जो शिवराव भाऊ के सबसे छोटे पुत्र थे, शासन-भार दे दिया गया। पर अब वे पूर्णतया अँगरेजी सरकार के मातहत हो गए और उन्हें अपने यहाँ एक अँगरेजी टुकड़ी रखना और उसके खरच के लिए सवा दो लाख रुपये वार्षिक देना स्वीकार करना पड़ा।

झाँसी के राजाओं का यह इतिहास हमको बतलाता है कि किस प्रकार अपनी ही असावधानी और संगठन के अभाव से इस देश में अँगरेजों के कदम धीरे-धीरे मजबूत होते गए और वे एक-एक करके राजाओं के राज्यों को अपने शासन में लाते चले गए? एक दिन वह भी था कि जब वे यहाँ व्यापारी के रूप में आए थे और सन् १७५३ तक 'एक दीन सेवक' की हैसियत से देहली के बादशाहों से छोटी मोटी रियासतों के लिए पैरों पर सिर रखकर प्रार्थना किया करते थे।

 पर उनके सौ वर्ष बाद वे ही व्यापारी यहाँ के बड़े-बड़े राजाओं के साथ मनमाना बरताव करने लगे और झूठे बहाने निकालकर उनके राज्यों को आत्मसात करने लग गए। अँगरेजों की इन चालों को देखकर भी भारतवासी सावधान नहीं हुए और जिसको अँगरेजों से अपना कोई लाभ सिद्ध होता दिखाई पड़ा, वही उनका सहयोगी बनकर देशवासियों की जड़ काटने लगा। 

भारतवासियों में राष्ट्रीय भावना का यह अभाव ही इसके पतन का मुख्य कारण रहा है। अब यद्यपि देश स्वतंत्र हो चुका है, तो भी यह त्रुटि पूरी तरह दूर नहीं हुई है। आज भी यहाँ के अधिकांश व्यक्ति राष्ट्रीय हित के सम्मुख व्यक्तिगत हित के ही प्रधानता देने वाले मिलते हैं, जिससे भारतीय समाज की उन्नति बहुत कुछ रुकी हुई है।