झाँसी पर शासन

 झाँसी पर शासन



इस बात को निश्चय रूप से नहीं कहा जा सकता कि झाँसी में देशी सेना द्वारा विद्रोही होकर जो ११४ अँगरेज स्त्री-पुरुषों को कतल किया गया उसमें रानी लक्ष्मीबाई का कितना हाथ था? यह तो सच है कि गदर प्रमुख नेता नाना साहब से उनका पुराना संबंध था और झाँसी के राज्य का अन्यायपूर्वक जब्त किया जाना भी ऐसी घटना थी, जिसके कारण वे नाना साहब की योजना में सम्मिलित मानी जा सकती हैं।

 पर स्त्री होने और सेना के अधिकारियों से किसी प्रकार संपर्क न होने के कारण ४ से ८ जून तक की घटनाओं में उनका कोई हाथ नहीं बतलाया जा सकता। इस अनुमान का समर्थन मार्टिन नाम के अंग्रेज के उस पत्र से होता है, जो सन् १८८९ में उसने लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर राव को भेजा था। वह अंगरेज उस समय झाँसी में ही था और किसी प्रकार विद्रोहियों से बचकर निकल भागा था। उसके पत्र का एक अंश इस प्रकार है

"तुम्हारी माता (लक्ष्मीबाई) के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया। उनके बारे में जितना ठीक हाल मैं जानता हूँ, उतना दूसरा कोई नहीं जानता । सन् १८५७ में जो अँगरेज झाँसी में मारे गए, उस घटना से उसका कोई संबंध न था। इतना ही नहीं, बल्कि किले में अँगरेजों के बंद हो जाने पर दो दिन तक वह उनको खाना भेजती रही। उसने कप्तान मारडन और कप्तान सेन को सलाह दी कि आप लोग सब स्त्री-बच्चों को लेकर ओर्छा के राजा के पास चले जाएँ तो झाँसी की अपेक्षा सुरक्षित रहेंगे। पर उस समय उन लोगों ने इस सलाह को न माना और अंत में उन्हीं सेना और जेल के लोगों ने उन सबको मार दिया।"

एक अन्य लेखक ने भी लिखा है-“अँगरेजों के किले में चले जाने के बाद महारानी छिपेतौर पर उनकी सहायता करती रहीं । उन्होंने हर रोज तीन-तीन मन आटे की रोटियाँ पकवाकर उनको भिजवाई और भी जिस तरह संभव था उनकी रक्षा का प्रयत्न किया।"

पर जब विद्रोहियों ने सब अँगरेज शासकों को मार दिया और स्वयं भी शहर छोड़कर दिल्ली की तरफ चल दिए, तो शहर को बिलकुल अरक्षित देखकर उसका प्रबंध उनको अपने हाथ में लेना पड़ा। ऐसे समय में अनेक स्वार्थपरायण और दूसरों की संपत्ति को लालच की निगाह से ताकते रहने वाले व्यक्ति उपद्रव खड़ा कर देते हैं। इन उपद्रवकारियों से अपनी रक्षा करने के लिए लक्ष्मीबाई को सेना की व्यवस्था करनी पड़ी और तोप, गोला, बारूद तथा अन्य हथियारों को तैयार करने के लिए कारखाना स्थापित करना पड़ा। महाराज गंगाधर राव के समय तक झाँसी के किले में इन सब अस्त्र-शस्त्रों का पूरा इंतजाम था, पर उनकी मृत्यु के बाद अँगरेजों ने उन सबको नष्ट कर दिया था, जिससे रानी अथवा उसके पक्षपाती कभी अकस्मात अँगरेजी सरकार के विरुद्ध लड़ने की तैयारी न करने लग जाएँ।

रानी लक्ष्मीबाई को जून १८५७ से मार्च १८५८ तक कुल नौ- दस महीने झाँसी पर शासन करने का अवसर प्राप्त हुआ। इस बीच में वे बराबर बड़े अंगरेज अधिकारियों को इस बात का विश्वास दिलाती रहीं कि मैं यह कार्य अपना अधिकार जमाने की मंशा से नहीं कर रही हूँ, वरन जब तक सरकारी अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण राज्य में उपद्रव और लूटमार का भय है, तब तक के लिए मैंने शासन-व्यवस्था अपने हाथ में ले ली है । पर अँगरेजों ने उसकी बातों पर विश्वास नहीं किया और वे यही मानते रहे कि वह भीतर ही भीतर विद्रोहियों से मिली हुई हैं। परिणाम यह हुआ कि अंत में रानी को वास्तव में विद्रोह में भाग लेना ही पड़ा और झाँसी का युद्ध 'सन् १८५७ की गदर' का सबसे मुख्य संग्राम माना गया ।

 यद्यपि दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह, कानपुर के नाना साहब, लखनऊ की बेगम हजरत महल आदि उस समय विद्रोहियों के प्रधान नेता माने गए, पर आज उनका नाम केवल इतिहास के कुछ पाठकों को ही याद रह गया है, जबकि 'झाँसी की रानी' नगरों में ही नहीं, गाँव-गाँव में प्रसिद्ध है। आज भी छोटे-छोटे बालक हर जगह यह गाते हुए दिखाई पड़ते हैं।